• कहने को तो हम मुस्लिम उम्माह है, असल में अब वह जो मुस्लिम उम्माह हुआ करती थी, अब नहीं रही, इस बात को तो अल्लामा इकबाल ने भी उस दौर में मान लिया था, अगर वाकई में  होते वही मुस्लिम उम्मांह होती, तो हम वैसे ही होते जैसे अल्लाह और उसके रसूल ने हुकुम दिया है, ना की हुकुम की नाफरमानी या करते हुए नजर आते, अब मुसलमान सिर्फ एक कॉम यत बनकर रह गई है, टुकड़ों टुकड़ों में बटें हुए लोग कभी मुस्लिम उम्माह नहीं हो सकती, कुरान में तो साफ तौर पर कहा है कि तुम इस्लाम की रस्सी को मजबूती से थाम लो और फूट ना डालो, लेकिन मुसलमानों के हालात देखकर तो आज मुझे यह कहते हुए बड़ा अफसोस होता है, कि जब एक गैर मुसलमान यह मुझसे कहता है कि कहने को तो तुम दुनिया में यह कहते फिरते हो कि तुम मुस्लिम उम्माह हो, असल में तुम लोग गुटों में बंटे हुए लोग सिर्फ, आज हालात देखकर तो  लगता है, कि हमारी हालात और डाकुओं के ग्रहो तारा नजर आते हैं जो आपस में लड़ रहे हैं और दौलत के पीछे भाग रहे हैं, बस मेरी बात अगर किसी भाई को ठसे पहुंची हो तो मैं पेश की मजरत चाहता हूं लेकिन सच्चाई कहने से क्या डरना!,