ड्रैगन के आक्रामक तेवर

चीन ने दुनिया के भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अपनी दबाव की कूटनीति के कारण एक भूचाल-सा ला दिया है. वैसे, चीन वैश्विक स्तर पर संतुलन और स्थिरता को बदलना चाहता है. चीन का यही विस्तारवाद और 17 राष्ट्रों के साथ अनसुलझे सीमा विवाद पूर्व से साउथ चाइना सागर और हिमालय से लेकर और मध्य एशिया तक फैले हैं. इसी से अंदाजा लगा सकते हैं कि चीन किस तरह के युद्धपरक माहौल को पैदा कर रहा है.

विशेष रूप से पिछले पांच वर्षों में इस आक्रामक व्यवहार में वृद्धि देखी गई है. चीन अपने कोर राष्ट्र हित के सामने किसी प्रकार का समझौता या बातचीत को महत्व नहीं देता. वह अपने मजबूत राजनीतिक शिकंजे, प्रभावी आर्थिक नीतियों और सैन्य दबाव से इस उद्देश्य को पूरा कर रहा है.

वह अपने को एक राष्ट्र नहीं समझता बल्कि एक सभ्यता समझता है, जो सदियों से असुरक्षा में अपमान को बर्दाश्त करती आई है और अब चीनी सपने को साकार करने के पथ पर अग्रसर है.

CCP (चीनी कम्युनिस्ट पार्टी) विशेष रूप से शी जिनपिंग के नेतृत्व में इसी स्पष्ट रणनीतिक इरादे के साथ काम कर रही है. उनकी लाइन क्लीयर है- 'शी चीन पर शासन करेंगे और चीन दुनिया पर शासन करेगा'. हालांकि चीन अपने इस इरादे की ओर मुखर होकर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे अपनी गलती की रेखाओं को बढ़ाता जा रहा है. इससे दबाव के कई नए बिन्दु उजागर हो रहे हैं, जो उसके नए उद्देश्यों में बाधा या गतिरोध पैदा कर रहे हैं.

चीन के व्यवहार को ऐसे समझें

दुनिया के सामने दूसरी सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था के साथ और एक वर्ल्ड क्लास सेना की ताकत से चीन एक प्रमुख वैश्विक शक्ति के रूप में उभर के सामने आया है. हालांकि चीन का चरित्र उसके नाम से कम ज्ञात होता है बल्कि इससे ज्यादा समझा जा सकता है, जो अब बताया जा रहा है.

ड्रैगन के DNA में दबाव की कूटनीति, असहिष्णुता, डराना, नाजियों की भांति विस्तारवाद वाली विचारधारा और क्षेत्रीय तथा वैश्विक पटल पर अपनी धाक जमाने वाली नीति रही है. चीन अपने आपको पूरी ताकत से सामने रखता है. उसका प्रयास होता है कि वह अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में केंद्रीय भूमिका में रहे और वैश्विक स्तर पर प्रभाव रखने वाले संस्थानों में प्रमुखता से भागीदारी भी निभाए.

यही कारण है कि चीन हमेशा से कई प्रकार की अलग-अलग रणनीति अपनाता है ताकि वह अपने ध्येय को हासिल कर सके. साथ ही वह वैश्विक स्तर पर उन बातों को नकार भी देता है, जो चीन के हिसाब से सही नहीं हैं. इनमें मानवाधिकार का मुद्दा, क्षेत्रीय दावे आदि शामिल हैं.

वे 4 बातें जो चीन के व्यवहार में खासतौर पर दिखाई देती हैं और जिसमें चीन की रणनीतिक बदलाव की नीति भी साफ दिखाई देती है:-

पहला, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा जैसे मुद्दे पर चीन सहयोग के बजाय दबाव से काम लेता है. आमतौर पर यह प्रतिस्पर्धा अमेरिका के साथ है, जो इन दोनों देशों के बाहर रहने वाली 6 बिलियन आबादी पर भी असर डालती है. चीन की विस्तारवाद की नीति और कर्ज वाली कूटनीति इस प्रतिस्पर्धा का परिचय देती है और बताती है कि किस प्रकार चीन अपना असर दिखाना चाहता है.

दूसरा, चीन 'सेंचुरी ऑफ ह्यूमिलेशन' (सदियों के अपमान) की यादों से ग्रसित सभ्यता में असुरक्षा और अविश्वास के साथ चल रहा है. उसके कार्यों में अंतरमुखी सुरक्षात्मक व्यवहार साफतौर पर देखा जा सकता है. सेना के जरिए वह रणनीतिक तौर पर दबाव बनाने पर ही केंद्रित रहता है. आर्थिक मामलों में भी चीन वैश्विक स्तर पर दूसरों को खुद पर निर्भर करने की रणनीति पर चल रहा है ताकि वह विश्व में सुपरपावर बन सके.

तीसरा, चीन ने राजनीतिक आयाम में सांप्रदायिकता को एक कोर शक्ति के रूप में पेश किया है. पिछले चार दशकों में अपनी वृद्धि और विकास में इसे ही प्रमुख ताकत के रूप में दिखाया. वहीं लोकतंत्र को अलगाववाद को बढ़ावा देने वाला और मूल हितों को कमजोर करने वाला बताया. बता दें कि चीन का राष्ट्रवाद चीन को एक कम्युनिष्ट राष्ट्र रखने, सदियों के अपमान की याद और वैश्विक ताकत बनने के इर्द- गिर्द ही घूमता है.

चौथा, सेना के पहलू की बात की जाए तो इसमें उच्च तकनीक का ध्यान रखा जाता है, जो इसे और ताकतवर बनाता है. नीले पानी में इसकी नौसेना की रणनीति (Anti -Access Area Denial) भी इसे और मजबूत बनाती है.

चीन की SWOT यानी Strength(ताकत), Weakness (कमजोरी), Opportunity (अवसर) और Threats (खतरा) का विश्लेषण

चीन का SWOT विश्लेषण इस बात को स्पष्ट रूप से उजागर कर रहा है कि जोखिम खतरनाक रूप से फैल रहा है. इसके साथ ही उसकी विस्तारवादी सोच उसके अपने विकास के लिए भी खतरा है. फिर भी वैश्विक प्रणाली से सहयोग और साथ लिया जा सकता है, लेकिन यह भी पूरी तरह से चीन के व्यवहार पर निर्भर करता है.

चीन की ताकत

चीन की ताकत का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि कोविड-19 काल में भी सकारात्मक वृद्धि दर के साथ एकमात्र राष्ट्र बने रहने का आर्थिक कौशल उसके पास है. चीन का राज्य की कंपनियों पर सीधा नियंत्रण है और प्राइवेट सेक्टर के साथ भी वह एक खास योजना बनाकर चलता है, जो कि नीति निर्माताओं को आर्थिक चक्र के उतार-चढ़ाव को सही तरीके से मैनेज करने की शक्ति देता है. इन्हीं नीति निर्माताओं ने विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर पैनी नजर रखते हुए वैश्विक बाजार पर चीन केंद्रित निर्भरता और आपूर्ति का सफल चक्र बना रखा है. राजनीतिक नेतृत्व की बात करें तो सभी तरह की आलोचनाओं को उन्होंने सिर्फ और सिर्फ विकास ही दिखाया है.

बेशक, चीन ने अति राष्ट्रवाद के नए स्तर को छू लिया है. चीन अपनी सेना को लगातार मजबूत ही करता जा रहा है. इसने युद्ध के सभी छह आयामों में (भूमि, वायु, समुद्र, अंतरिक्ष, उप-सतह, साइबरस्पेस ) में खुद को शक्तिशाली बना लिया है. इसके साथ ही न्यूक्लियर क्षमता से लैस बैलेस्टिक मिसाइलें सहित अन्य सैन्य उपकरण इसे और ताकतवर बनाते हैं.

चीन की कमजोरियां

चीन की कमजोरियां उसके ही भीतर की कई दरारों और कमियों में निहित हैं. इनमें चीन के प्रमुख हिस्सों में आंतरिक मतभेद, भेदभाव, मानवाधिकार उल्लंघन,अलगाववाद और पृथकतावाद जैसी समस्याएं उसके सपनों को फीका कर रही हैं.

वैसे, इन कमजोरियों में वुहान वायरस की वजह से चीन के प्रति अन्य देशों में विश्वास की कमी के साथ ही उसकी दबाव की कूटनीति के प्रति नाराजगी और साथ ही एक बच्चे की नीति भी शामिल है. इसके अलावा चीन की सबसे बड़ी कमी उसकी मलक्का खाड़ी पर अत्यधिक निर्भरता भी है. इसी खाड़ी को बंद करने का अंदेशा उसे सता रहा है, क्योंकि इस खाड़ी के जरिए जो तेल उसके कल कारखानों को चला रहा है, वह इससे रुक सकता है.यही कारण है कि चीन ने बीआरआई (बेल्ट रोड इनिशिएटिव) नीति को अपनाया ताकि समय पर इसका प्रयोग किया जा सके.

इसके साथ ही सैन्य फ्रंट पर चीन की सुसज्जित सेना के पास लड़ाई का अनुभव नहीं है. चीन की सेना ने 1979 में वियतनाम के खिलाफ आखिरी बार लड़ाई लड़ी थी, जिसकी जीत का दावा भले ही किया जाए, लेकिन हकीकत में वह जीत पूरी तरह स्पष्ट नहीं थी.

चीन के अवसर

चीन के अवसर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक सुधारों में निहित हैं, जिसका इस्तेमाल वह विश्व के साथ चलने और अपनी गलतियों को छिपाने के लिए समय समय पर करता ही है. चीन के आर्थिक कौशल, तकनीकी ज्ञान और वैश्विक कद ने इसे दुनिया में स्वास्थ्य देखभाल, वैश्विक आर्थिक पुनरुद्धार और पर्यावरण संरक्षण में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने का अवसर दिया. अगले कुछ वर्ष चीन के लिए विदेशनीति और कूटनीति के लिहाज से अधिक संघर्षपूर्ण और अहम हैं. उसे इस दिशा में सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना होगा ताकि प्रतिस्पर्धा और टकराव को रोका जा सके.

चीन को है ये खतरा

चीन की ओर से खतरा इस बात से दिखता है कि उसकी विदेश नीति का सैन्यकरण हो चुका है और उसकी सेना राजनीतिक हो गई है. चीन की धार्मिक असहिष्णुता की नीति और उसके प्रमुख इलाके और आसपास के क्षेत्रों में सामाजिक भेदभाव के चलते जो दरारें पैदा हुई हैं वे तिब्बत, मंगोलिया और शिनजियांग राज्यों में अलगाववाद को बढ़ावा दे रही हैं. ऐसे में हांगकांग और ताइवान को भी और वैश्विक समर्थन मिल सकता है ,जो चीन के लिए शर्मिंदगी होगी.

इसके साथ ही चीन की अर्थव्यवस्था के लिए इस समय सबसे बड़ा खतरा बढ़ता हुआ कर्ज है. 2008 की वित्तीय समस्या जो काफी मजबूत रही और काफी लंबे समय तक चली तो उस समय चीन ने चार ट्रिलियन की प्रोत्साहन राशि अर्थव्यवस्था में डाली. इससे अर्थव्यवस्था पर कर्ज को बोझ बढ़ा. 2008 में जो कर्ज कुल जीडीपी का 140 प्रतिशत था, वह 2019 में 260 प्रतिशत हो गया. रणनीतिक तौर पर चीन जो खतरा आज झेल रहा है, वह खुद उसके व्यवहार का नतीजा है, जिससे पूरे विश्व में उसके खिलाफ नाराजगी है. इसके चलते चीन के विरोध में सुरक्षात्मक व्यवस्थाएं तैयार हुई हैं. इसका असर स्पष्ट रूप से चीन की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा और आंतरिक राजनीति पर भी पड़ेगा. हो सकता है कि यह सत्ता परिवर्तन का कारण भी बने.

वैसे, चीन के उत्थान में पूरे विश्व के लिए संभावनाएं भी रहीं और खतरे भी रहे. किसी भी प्रकार का वैश्विक जवाब इस पर निर्भर करेगा कि चीन शांतिप्रिय तरीके से विश्व के साथ चलने की नीति अपनाता है या फिर तनाव कायम रखने की नीति पर चलता है. इसी पर ही आगे का मार्ग तय होगा. यद्यपि चीन अपने रणनीतिक दबाव की नीति पर आगे चलता है तब चीन पर दबाव बनाने के सात तरीके हैं, जो चीन के इस मार्ग पर बाधक साबित होंगे. इस पर बात इस सीरीज के अगले लेख में....