.. राजीव शर्मा ..

पानी का ठहराव और बहाव दो ऐसी बातें हैं जिनसे हमें शिक्षा लेनी चाहिए। अगर ठहराव आ गया तो उसमें खराबी पैदा होने लगेगी। एक खराबी अपने साथ कई खराबियां लेकर आएगी। ठहरे हुए पानी में कीड़े पड़ जाते हैं। ये कहीं बाहर से नहीं आते, उसी में से पैदा होते हैं। इसलिए बहते पानी को अच्छा माना गया है।

लेकिन बहाव कैसा हो? उसमें भी एक मर्यादा होनी चाहिए। अगर पानी मर्यादा छोड़ देता है तो तबाही आती है। इसलिए ठहराव और मर्यादाहीन बहाव दोनों ही खतरनाक होते हैं।

हमें सामाजिक जीवन में इन बातों को सावधानीपूर्वक लागू करना चाहिए। हमें न तो ठहरे पानी की तरह होना चाहिए कि उसमें खराबियां पैदा होने लगें और न उस बाढ़ की तरह जो अपने पीछे तबाही के निशान छोड़कर जाए।

हमें उस पानी की तरह बनना है जो धरती को सींचे तो अन्न उगाए और किसी का पेट भरे; जो जहां जाए, फूल उगाए और अपनी सुगंध हर कहीं फैलाए; जो किसे के सूखे कंठ को आर्द्र कर जाए और उसकी सांसों का सहारा बन जाए।

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मनुष्य का जीवन इन कार्यों के लिए होना चाहिए। अगर हम एक ही जगह रुककर बैठ गए तो न केवल दुनिया से पिछड़ जाएंगे, बल्कि अपने अंदर कई खराबियां पैदा कर लेंगे। अगर हम बेकाबू हो गए तो बिगाड़ और बर्बादी छोड़ जाएंगे।

इसलिए दोनों में संतुलन कायम रखते हुए लगातार आगे बढ़ते रहना चाहिए, सकारात्मक चीजों को समाज का हिस्सा बना लेना चाहिए। जिसने धरती पर आकर इसे बेहतर बनाने के लिए कुछ नहीं किया, तो उसने क्या किया? उसका जीवन तो व्यर्थ गया। धरती के लिए फायदेमंद बनें। जो धरती के लिए फायदेमंद नहीं रहता, वह धीरे-धीरे अपनी अहमियत खो देता है।

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एक मित्र के प्रश्न का उत्तर:

1. मैं कोई पंडित या ज्ञानी नहीं हूं।

2. मैं कोई मौलवी या आलिम नहीं हूं।

3. मैं कोई ऐसी पुण्यात्मा नहीं हूं कि उसने एक भी पाप नहीं किया।

4. मनुष्य में कमजोरियां होती हैं, अगर मुझमें भी कुछ हों तो इसमें आश्चर्य की कौनसी बात है?

5. हर मनुष्य की कोई भाषा/बोली होती है, मेरी भी है। अगर वह उसमें कुछ बोलता, लिखता या अनुवाद कर लेता है तो इसमें कौनसी बड़ी बात है? मैं मानता हूं कि यह काम हर कोई कर सकता है।

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6. मैं ऐसा कोई भ्रम नहीं पालता कि मैंने जीवन में कोई बहुत बड़ा काम किया है। मैं तुच्छ मनुष्य हूं और इस तुच्छता से प्रसन्न एवं संतुष्ट हूं।

7. मैं जो हूं नहीं, वैसा दिखने का नाटक क्यों करूं? मैं नहीं करता। मैं मुनाफ़िक़ नहीं बन सकता।

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