शरीर पर भस्म, बालों की लंबी जटाओं वाले निर्वस्त्र और दुनिया की मोह-माया से मुक्त नागा साधुओं को आपने देखा ही होगा. ये नागा संन्यासी सिर्फ कुंभ मेले में दिखाई देते हैं और सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र बनते है. लेकिन आपाके बता दें कि शरीर पर भस्म और हाथ में चिलम लिए इन साधुओं को नागा संन्यासी के संसार में यूं ही एंट्री नहीं मिल जाती है. इसके पीछे 6 से 12 साल का तप, गुरु की सेवा और अखाड़े में रजिस्ट्रेशन करना जरूरी होता है. इसके बाद ये साधु अखाड़े में पांच गुरु को खोजते है. पांच गुरु मिलने के बाद इन्हें 6 साल से 12 साल तक की तप साधना के बाद स्थान के अनुसार दीक्षा और पदवी दी जाती है.

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कुंभ महापर्व हर 12 साल में आता है लेकिन यह पर्व हर 3 साल में एक स्थान पर लगता है. कुंभ महापर्व का मेला देश के चार स्थान हरिद्वार,प्रयाग,उज्जैन और नासिक में आयोजित होता हैं. अब सबसे खास बात इन स्थानों पर मिलने वाली दीक्षा में इन साधुओं को स्थान के अनुसार पदवी मिलती है.

किस स्थान पर दीक्षा लेने से मिलती है कौन सी पदवी

हरिद्वार कुंभ: हरिद्वार कुंभ में होने वाले महापर्व में सबसे ज्यादा साधु नागा संन्यासी की दीक्षा लेते है. यहां 12 साल की तप साधना के बाद इन्हें महापुरूष का पद मिलता है और इसके बाद दशविधि संस्कार की प्रक्रिया के बाद इन्हें बर्फानी नागा की पदवी मिलती है. यहां दीक्षा लेने वाले साधुओं को बर्फानी नागा कहां जाता है. क्योंकि ये बिना गुस्से के शांतिपूर्वक साधना करते है. यहां से दीक्षा लेने के बाद ये उत्तराखंड की पहाड़ियों में साधना के लिये अपने गुरु की आज्ञा लेकर अखाड़े के कोतवाल की देख रेख में एकांत वास में साधना के लिये बर्फिली पहाड़ियों में चले जाते है. यहां पहाड़ियों में गुफा खोज कर साधना का क्रम शुरु होता है. तीन साल की साधना के बाद ये बर्फानी नागा तीन साल बाद अगले स्थान पर होने वाले कुंभ महापर्व में अपने गुरु से मिलने आते हैं. दो माह के इस पर्व के समय ये अपने गुरु की सेवा करते है और फिर महापर्व संपन्न होने के बाद ये गुरु की आज्ञा से पुन: पहाड़ियों में साधना के लिये निकल पड़ते हैं.

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प्रयाग कुंभ: प्रयाग राज के कुंभ में जो साधु संन्यास लेकर नागा साधु बनता है उनका कार्य संन्यासी ​जीवन में राजयोग की कामना करना होता हैं. प्रयाग राज में दीक्षा लेने वाले नागा साधु दीक्षा लेने के बाद राज-राजेश्वर नागा कहलाते हैं. लेकिन इस पदवी को लेने वाले नागा संन्यासी की सबसे खास बात यह है कि इनकी संख्या बहुत कम होती है. क्योंकि इस पद की दीक्षा लेने वाले नागा संन्यासी को 12 साल की तप साधना करनी होती है. वहीं दूसरी ओर इनके लिये गुरु का आदेश की सबकुछ होता है. इन पदवी वाले नागाओं को अगर उनके गुरु आदेश कर दें कि आपको अब 6 साल तक एक पैर पर खड़े रहकर तप साधना करना होगा तो गुरु का आदेश उक्त नागा का मानना पड़ता है. इसके बाद अगर वह 6 साल की इस साधना में सफल होता है तो उसे राजा राजेश्वरी नागा के साथ खडेश्वरी नागा बाबा की उपाधी मिलती है. ऐसे कम ही साधु है जो इस साधना को पूर्ण कर पाते हैं. 

उज्जैन कुंभ: वैसे तो उज्जैन देश में एक मात्र स्थान है जहां कुंंभ महापर्व नहीं सिंहस्थ महापर्व होता है. क्योंकि यहां सिंह राशि में ग्रहों का गोचर होने के समय सिंहस्थ पर्व मनाया जाता है. बाकी तीन स्थानों पर होने वाले पर्व को कुंभ राशि में ग्रहों के गोचर होने पर मनाया जाता है. यहां की दीक्षा सबसे अनोखी होती है यहां दीक्षा प्राप्त करने वाले नागा साधु को खूनी नागा की पदवी मिलती है. यहां दीक्षा लेने के लिये एक नागा साधु को अस्त्र और शस्त्रों की ट्रेनिंग दी जाती है जो आर्मी से भी कठीन होती है. यहां संन्यास लेने के बाद नागा साधु के स्वभाव में भी काफी बदलाव देखने को मिलता है. यहां के नागा बहुत ज्यादा गुस्सैल होते हैं.

नासिक कुंभ: नासिक में आयोजित होने वाली कुंभ महापर्व में दीक्षा लेने वाले साधु को खिचड़ी नागा कहलाते हैं. ये परिवेश अनुसार शांत या उग्र दोनों होते है. यहां दीक्षा लेने वाले नागा साधु को सभी प्रकार की ट्रेनिंग दी जाती है. पहले तीन वर्ष अखाड़े में गुरु के साथ रहकर गुरु और अखाड़े की सेवा इसके बाद अगले तीन वर्ष अस्त्र और शस्त्र की ट्रेनिंग,इसके बाद 3 वर्ष साधना करने की प्रक्रिया अगर साधु इन सब में पास हो जाता है तो उसे गुरु की तरफ से 9 साल सेवा के बाद महापुरुष की उपाधि के साथ नासिक में होने वाले कुंभ महापर्व में खिचड़ी नागा की दीक्षा और उपाधि प्राप्त होती है.

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