.. राजीव शर्मा ..

सोशल मीडिया पर इस्लाम के साथ हिंसा को जोड़कर इतना भ्रामक प्रचार किया जा रहा है कि बहुत लोग इस पर जल्दी यकीन कर लेते हैं। इनमें से एक प्रचार यह है कि इस्लाम के आने से पहले दुनिया में बहुत शांति थी, लेकिन उसके बाद चारों ओर मारकाट का माहौल बन गया।

इस दुष्प्रचार के समर्थन में अफगानिस्तान की दलील दी जाती है कि पहले यहां बौद्ध धर्म को मानने वाले लोग थे। यहां हर कोई सुख-शांति से रहता था। लोग खेती करते, पशु चराते, थोड़ा-बहुत कारोबार कर लेते। इस्लाम के आने से यहां हिंसा का वातावरण हो गया, जिसकी वजह से कोई सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा इराक, सीरिया जैसे देशों का उदाहरण भी दिया जाता है।  

इस दावे के मुताबिक, जहां भी इस्लाम है वहां हिंसा, मारकाट, बम धमाके होते ही होते हैं और जहां गैर-मुस्लिम रहते हैं, वहां शांति का वातावरण रहता है।  

इस बात में कोई शक नहीं कि आज अफगानिस्तान, इराक, सीरिया जैसे देशों में हिंसा का भयंकर वातावरण है। यह भी सच है कि यहां की करीब शत-प्रतिशत आबादी मुसलमान है, लेकिन यह सच नहीं है कि इधर मारकाट और हिंसा की वजह इस्लाम है।

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अगर इराक की बात करें तो अमेरिका द्वारा मार्च 2003 के हमले से पहले यह देश बहुत शांत और समृद्ध हुआ करता था। युद्ध ने इस खूबसूरत देश को तबाह करने में कसर नहीं छोड़ी। एक समय था जब भारत से लोग यहां नौकरी करने जाते थे। इराक के तत्कालीन राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन का भारत के प्रति बहुत ही मित्रतापूर्ण रवैया था। अगर इस्लाम ही अशांति की वजह है (उक्त दावे के अनुसार) तो उस समय यहां इतनी शांति क्यों थी? क्या तब ये लोग मुसलमान नहीं थे?

कुछ ऐसा ही मामला सीरिया का है। मार्च 2011 में गृहयुद्ध की आग भड़कने के बाद आज इसके खूबसूरत शहर खंडहर बन चुके हैं। अगर उससे पहले देखें तो सीरिया में ऐसे हालात नहीं थे। अफगानिस्तान का मामला भी कम गंभीर नहीं है। अगर गूगल पर अफगानिस्तान की पुरानी तस्वीरें तलाशें तो आपको हैरानी होगी कि तब यह बहुत शांत इलाका हुआ करता था। यहां भी बड़ी संख्या में भारतीय रहते और कारोबार करते थे।  

महान स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस अफगानिस्तान होते हुए ही जर्मनी गए थे। तब अफगानियों ने उनकी बड़ी मदद की थी। आज हम अफगानिस्तान की जो हालत देख रहे है, उसके पीछे अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए की बड़ी भूमिका रही है।

सोवियत संघ के टुकड़े करने के लिए यहां धर्म के नाम पर कट्टरवाद को भड़काया गया। पाकिस्तान के तत्कालीन सेना प्रमुख और भुट्टो का तख्तापलट कर राष्ट्रपति बने जनरल जिया उल हक ने अमेरिकी डॉलर से यहां लड़ाके तैयार किए थे। फौजी अफसरों ने भी खूब डॉलर कमाए थे।  

जब सोवियत संघ के ​टुकड़े होने के साथ सीआईए का मिशन पूरा हो गया तो ये ही लड़ाके अफगानिस्तान और पाकिस्तान के लिए सरदर्द बन गए। इसकी आंच अमेरिका तक पहुंचने लगी तो सीआईए ने फिर डॉलर भेजे और मुशर्रफ के जमाने में इन्हीं लड़ाकों के खिलाफ लड़ाई शुरू हुई।  

इसके प्रभाव कई घटनाओं के रूप में सामने आ रहे हैं। जनरल जिया से लेकर आज तक कट्टरपंथ की जो पौध तैयार की गई, उनमें से बहुत को पता ही नहीं होगा कि उनके लिए पैसा कहां से आया। आज परवेज मुशर्रफ दुबई स्थित आलीशान फ्लैट में रहते हैं। उनकी लंदन और कई जगह संपत्तियों की रिपोर्टें हैं। क्या पाकिस्तान के सेना प्रमुख की ईमानदारी से मिली पेंशन से ऐसे ठाठ संभव हैं?  

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अशांति, अराजकता, मारकाट, बम धमाके आदि किसी धर्म की देन नहीं हैं। आज जिन मुस्लिम बहुल देशों में ये घटनाएं हो रही हैं, वहां असल कमी, खराबी उनके शासकों में है, जो हालात पर काबू नहीं पा सके। अगर इस्लाम ही मारकाट की वजह होता तो सबसे ज्यादा हिंसा सऊदी अरब में होती, लेकिन यह तो दुनिया के सर्वाधिक शांत देशों में से है। मैं ऐसे कितने ही लोगों को जानता हूं जो सऊदी अरब में काम करते हैं। वे बताते हैं कि वहां की कानून व्यवस्था भारत की कानून व्यवस्था से बहुत बेहतर है।

दूसरी ओर, वेनेजुएला, कांगो, उत्तर कोरिया और म्यांमार जैसे उदाहरण हैं, जो पूरी तरह से गैर-मुस्लिम बहुल हैं। यहां शासकों ने ही जनता की जबरदस्त दुर्गति कर रखी है। यहां भी भयंकर हिंसा होती है, लेकिन मीडिया की इनमें कोई दिलचस्पी नहीं, क्योंकि यहां मुसलमान नहीं हैं।  

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