वेब सीरीज के इस दौर में इन दिनों ‘बीहड़ का बागी’ की जबरदस्त चर्चा है. एमएक्स प्लेयर (MX Player) पर रिलीज हुई यह सीरीज यूपी के चर्चित ददुआ डाकू की जिदंगी पर आधारित है. एक ऐसा डाकू जो पुलिस की नजर में तो खलनायक था लेकिन गरीबों के लिए वह किसी मसीहा से कम नहीं था. पर्दे पर ददुआ के किरदार को निभाया है एक्टर दिलीप आर्या ने. फतेहपुर के अमौली गांव में अपने पिता की तरह मजदूरी करने वाले दिलीप ने इस फिल्म के साथ अपने जीवन संघर्ष को हमारे साथ साझा किया.

ददुआ के बेटे से ली एनओसी

दिलीप कहते हैं, 'इस फिल्म को काफी रिसर्च के बाद हमने बनाया है. हमने उसी दौरान यह महसूस किया था कि शिव कुमार पटेल उर्फ डाकू ददुआ की वास्तव में बहुत इज्जत है. लोग उनकी पूजा करते थे. आज भी फतेहपुर में ददुआ मंदिर है जो बहुत ही भव्य है. हालांकि फिल्म को हमने काल्पनिक ज्यादा रखा है. फिल्म बनाने से पहले हमारे डायरेक्टर ने ददुआ के बेटे से एनओसी ली थी. और यही तय हुआ था कि ददुआ की जिंदगी के साथ हम काल्पनिक चीजों को जोड़ कर फिल्म बनाएंगे और वैसा ही हुआ.'

दूसरे शेड्यृल में फाइनल हुआ

दिलीप कहते हैं, 'इस वेब सीरीज के डायरेक्टर हैं रितम श्रीवास्तव. जो रक्तांचल वेब सीरीज का निर्देशन भी कर चुके हैं. मेरे स्ट्रगल के दिनों में रितम और मैं एक साथ एक रूम में रहा करते थे. काम तो मिल नहीं रहा था तो कभी कहानी तो कभी चुटकुले से मैं टाइम पास करता था. फिर रितम को प्रकाश झा के साथ काम करने का मौका मिला. वह चले गए और जब वे अपनी वेब सीरीज बनाने लगे तो उन्हें मेरी याद आई. मेरे साथ उन्होंने एक शेड्यूल किया था. उसके बाद कई और कलाकारों को उन्होंने ददुआ के किरदार के लिए बुलाया लेकिन उन्हें जमा नहीं. आखिर में उन्होंने मेरे साथ ही फिल्म बनाने का फैसला किया. करीब 4 महीने रियल लोकेशंस में शूटिंग के बाद फिल्म वेब सीरीज की शक्ल में रिलीज हो चुकी है और जबरदस्त हिट हो चुकी है. इस वक्त नबर वन रेटिंग है हमारी सीरीज की.'

एनएसडी में पता चला था बीएनए के बारे में

अपनी एक्टिंग की शुरुआत के बारे में दिलीप कहते हैं, 'हमारे घर में अख्बार आता था और ना टीवी था. टीवी तो आज भी नही है. मैं बाहर की दुकानों पर अख्बार पढ़ा करता था. उसी में मैंने नसीर साहब का एक इंटरव्यू पढ़ा. उसमें उन्होंने बताया था नैशनल स्कूल ऑफ ड्रामा  (एनएसडी) में ऐक्टिंग की पढ़ाई होती है. बस उस इंटरव्यू को पढ़ने के बाद मुझे ऐक्टर बनने की झक चढ़ गई थी. मैं उस इंटरव्यू की कटिंग लेकर एनएसडी दिल्ली पहुंच गया. उस वक्त मैंने 12वीं तक की पढ़ाई ही की थी. वहां मुझे ऐडमिशन नहीं मिला. लेकिन वहीं मुझे लखनऊ के भारतेंदु नाट्य अकादमी (बीएनए) के बारे में पता चला. जहां 2005 में मेरा दाखिला हो गया था.'

आज भी भाई मजदूरी करते हैं

दिलीप कहते हैं, 'मेरे पिता मजदूर थे. हम भाई जब छोटे ही थे तो वह इस दुनिया को छोड़ कर चले गए थे. फिर वही काम मेरे भाईयों ने शुरू कर दिया. घर के हालात ऐसे थे कि मैं भी उनके साथ काम पर जाने लगा हालांकि मुझे उस वक्त आधी मजदूरी ही मिलती थी. मेरी उम्र कम थी तो मुझे सात रुपए रोज ही मिलते थे. फतेहपुर के पास जिस गांव में मैं रहता था वहां की गल्ला मंडी, ब्लॅाक की बाउंड्री में मैंने गारा ढोने का काम किया था. मेरे भाई तो आज भी मजदूरी करते हैं. मेरी फिल्म आई तो सभी बहुत खुश हैं. पूरे गांव में मेरी फिल्म की चर्चा है. अब बस इंतजार है मुझे अच्छी स्क्रिप्ट्स का. एक वक्त वह था जब मुम्बई में मुझे कहीं काम नहीं मिला था. उस वक्त खाने के लिए मैं गाड़ी में घूम-घूम कर ब्रांड्स के प्रचार का काम करने लगा था. इस काम के मुझे चार सौ रुपए मिला करते थे. अब तो मैं अपने परिवार के साथ मुम्बई में ही रह रहा हूं. उम्मीद करता हूं कि इस फिल्म के बाद मेरे पास काम जरूर आएगा.'