ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया

जाने क्यों आज तेरे नाम पे रोना आया

यूं तो हर शाम उम्मीदों में गुजर जाती थी

आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया.

बात 1951-1952 की है. मुम्बई सेंट्रल रेलवे स्टेशन से लखनऊ जाने वाली ट्रेन के फर्स्ट क्लास कूपे में मल्लिका-ए-गज़ल, बेगम अख़्तर मौजूद थीं. ट्रेन चलने ही वाली थी कि काली शेरवानी और पायजामा में एक शख्स दौड़ता हुआ उस डिब्बे में दाखिल हुआ. उसने कागज का एक पुर्जा बेग़म को थमाते हुए मिन्नत की, मेहरबानी करके इसे ट्रेन चेलने पर ही पढ़िएगा. वो कोई और नहीं, जाने-माने शायर शकील बदायूंनी थे. बेगम ने शकील की बात मान ली और उस कागज को तकिए के नीचे दबा दिया. रात जब गहराने लगी तो बेगम को उस कागज के टुकड़े की याद आई. कागज में यही गजल लिखी थी. उसी समय बेगम ने अपना हारमोनियम निकाला और रातभर इस गज़ल पर काम करती रहीं. जब ट्रेन भोपाल पहुंची तो गज़ल राग भैरवी में तैयार हो चुकी थी. एक हफ्ते के अंदर ये गज़ल बेगम ने लखनऊ रेडियो स्टेशन से पेश की और पूरे हिंदुस्तान ने इस गज़ल को हाथों-हाथ लिया था.

संवर गया उजड़ा मजार

अख्तरी बाई फैजाबादी यानी मल्लिका-ए-गज़ल बेगम अख्तर और लखनऊ का खास रिश्ता है. यूं कहें कि लखनऊ से उन्हें इतनी मोहब्बत थी कि वह जिंदगी के आखिर दिनों में यहीं बसीं और 46 साल से सआदतगंज स्थित पसंदबाग में कयामत की नींद सो रही हैं. पुराने लखनऊ की तंग गलियों में बेगम अख्तर का मजार कभी विरान थी, लेकिन बेगम अख्तर की मजार को संवारने का काम उनकी शिष्या स्व. शांति हीरानंद और सनतकदा संस्था के प्रयासों से संभव हो सका. केंद्र सरकार की ओर से भी इस काम के लिए मदद मिली. यहां पर बेगम अख्तर के साथ उनकी अम्मी की भी मजार है. पिछले कुछ सालों से उनकी पुण्यतिथि पर खास महफिल सजाई जाती है. सनतकदा की माधवी कुकरेजा बताती हैं, पहले ये जगह उजाड़ थी. यहां आने वाले बेगम अख्तर के प्रशंसक इसे देखकर मायूस हो जाते थे. फिर इसे संवारने का संकल्प लिया गया. मजार को खूबसूरत तरीके से ईट की दीवारों से घेरा गया. यहां नये खंभे भी बनाए गए. मजार पर मकराना के संगमरमर की खूबसूरत कारीगरी भी की गई, जो ताजमहल में देखने को मिलती है. इस बार कोरोना के चलते बेगम को वर्चुअली श्रद्धांजलि देने का आयोजन सनतकदा की ओर से किया गया है.

पीर ने कहा था मल्लिका हैं आप

इतिहासकार पद्मश्री योगेश प्रवीन कहते हैं कि बेगम अपनी मर्जी की मालकिन थीं. राजा महाराजाओं को भी उनकी जिद के आगे झुकना पड़ता था. बेगम का जन्म जिस महीने में हुआ उसी महीने में उन्होंने दुनिया को अलविदा भी कहा था. उनकी वसीयत थी कि लखनऊ के पसंदबाग में ही दफन किया जाए जहां उनकी अम्मी की कब्र भी है. उनके लिए यह भी कहा जाता है कि उन्हें एक पीर ने देखते ही मल्लिका कहा था. बात उस वक्त की है, जब अख्तरी 11 साल की थीं. उनकी अम्मी मुश्तरी बेगम उनके भविष्य को लेकर काफी परेशान रहा करती थीं. एक बार वो अख्तरी को लेकर बरेली के पीर अजीज मियां के यहां गईं. पीर अज़ीज़ मियां ने अख़्तरी को देखा और कहा, ‘आप तो मल्लिका हैं’ और अख़्तरी के हाथ से उनका वो नोटबुक ले लिया, जिसमें अख़्तरी ने गज़लें लिखी थीं. पीर साहब ने नोटबुक खोली और जिस पन्ने पर उन्होंने हाथ रखा, उस पन्ने पर बहज़ाद लखनवी की गज़ल लिखी थी.

दीवाना बनाना है तो दीवाना बना दे,

वरना कहीं तकदीर तमाशा न बना दे

पीर साहब ने अख़्तरी से कहा, ‘अगली रिकॉर्डिंग में इसे सबसे पहले गाना, शोहरत तुम्हारे कदम चूमेगी. फिर कलकत्ता में दुर्गा पुजा के दौरान अख़्तरी ने ये गज़ल गायी. सारंगी पर साथ थे उस्ताद बड़े गुलाम अली खां. पूरे बंगाल में तहलका-सा मच गया और ये तहलका जल्द ही सारे देश में फैल गया. पीर मियां की बात सच हो गई थी.