.. राजीव शर्मा ..

पिछले सौ सालों में हिंदू और मुसलमानों के सामाजिक व्यवहार का अध्ययन किया जाए तो दो बातें उभरकर सामने आती हैं- मुसलमानों को लगता है कि उनकी हर समस्या का समाधान इस्लामी शासन ही कर सकता है, तो हिंदुओं को लगता है कि आज़ादी के बाद उन्हें उनका सही हक नहीं मिला, बल्कि सेकुलरिज्म थोपकर धोखा किया गया। आज इनमें से बहुत लोगों का विश्वास है कि उनकी सभी समस्याओं का हल हिंदू राष्ट्र में निहित है।

हिंदू और मुसलमान दोनों ने ही अपने-अपने धार्मिक राष्ट्र की बहुत सुंदर छवि मन में बैठा रखी है। जैसे- दोनों का ही मानना है कि वहां ऊंच-नीच का भेदभाव नहीं होगा, न्याय का शासन होगा, लालच, झूठ, कपट, ईर्ष्या, वासना समाप्त हो जाएंगी, हर किसी की गरिमा का सम्मान होगा, महिला सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाएगी, किसी पीड़ित की एक पुकार पर शासन उसकी आवाज सुनेगा, हर पेट को रोटी और हर हाथ को काम मिलेगा, अश्लीलता नहीं होगी, महंगाई काबू में रहेगी, चोर-डाकू ढूंढ़ने से भी नहीं मिलेंगे, हर कोई साधु-संत हो जाएगा, भ्रष्टाचार नहीं होगा, दुनिया हमारी इज्जत करेगी, हर तरफ सुख-शांति का वातावरण होगा, हम दुनिया फतह कर लेंगे या विश्वगुरु बन जाएंगे।

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मैंने अब तक जितना अध्ययन किया और जितना अनुभव प्राप्त कर सका हूं, उसके बाद इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि दुनिया में ऐसा कोई राष्ट्र है ही नहीं और न आने वाले एक हजार सालों में ऐसा संभव होगा। इन विशेषताओं की थोड़ी-बहुत झलक कहीं मिलती है तो वे या तो कुछ यूरोपीय देश हैं अथवा वे देश जिन्होंने अच्छी नीतियों के साथ सेकुलरिज्म (सभी धर्मों के प्रति आदरभाव) को अपनाया।

मेरे पाकिस्तानी मित्र मुझे क्षमा करेंगे क्योंकि जब भी किसी धार्मिक राष्ट्र की विफलता का उदाहरण देना होता है तो मैं उनके ही देश का जिक्र करता हूं। यह उनके प्रति मेरी दुर्भावना नहीं है। मैं तथ्य प्रस्तुत कर रहा हूं। मैं आगे हमारी कमियां बताऊंगा। अगर आपने सच में कोई कमाल किया होता तो मैं उस सूरत में सबसे पहले आपका उदाहरण देता। इस समय जब मैं ये पंक्तियां लिख रहा हूं तो पाकिस्तान बने 75 साल से ज्यादा हो चुके हैं। यह एक बहुत लंबी अवधि है। अगर धार्मिक राष्ट्र से ही समस्याओं का समाधान हो सकता तो अब तक पाकिस्तान क्या से क्या हो गया होता!

वहां आज भी ऊंच-नीच, अमीर-गरीब, ताकतवर-कमजोर का भेदभाव है। लोगों के साथ अन्याय भी होता है। लालच, झूठ, कपट, ईर्ष्या सबकुछ मौजूद है। इंटरनेट पर अश्लील सामग्री देखने में यह देश पहले नंबर पर है। महिला सुरक्षा का बुरा हाल है। कितने ही चीखते रहो, सुनवाई करने वाला कोई नहीं है। भुखमरी, बेरोजगारी खूब है। महंगाई आसमान छू रही है। वहां चोर-डाकू जितना लूटते हैं, उससे ज्यादा सरकारी दफ्तरों में बैठे अफसर, कर्मचारी आम जनता को लूटते हैं। दुनिया में इज्जत इतनी है कि 75 साल बाद भी इनका पासपोर्ट पांच सबसे घटिया पासपोर्ट में शामिल किया जाता है। अगर कथित इस्लामी राष्ट्र इतना ही असरदार है तो पाकिस्तान की यह हालत क्यों है? उसे तो हर अच्छाई के मामले में बुलंदी पर पहुंच जाना चाहिए था!

इस समय आपके मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि ये समस्याएं कमोबेश हमारे देश में भी मौजूद हैं। फिर पाकिस्तान की चर्चा क्यों? इसकी एक वजह है। भारत और पाकिस्तान के लोग मूलत: एक ही हैं। भले ही धर्म अलग-अलग हो।

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हमारे सोच-विचार, सामाजिक तौर-तरीकों में ज्यादा अंतर नहीं है। क्या भारत में भेदभाव नहीं होता? क्या यहां ताकतवर कमजोर को नहीं दबाता? क्या यहां रिश्वतें नहीं ली जातीं? क्या यहां दुष्कर्म नहीं होते? महंगाई, भ्रष्टाचार, चोरी, डकैती सबकुछ यहां जारी हैं। इंटरनेट पर अश्लील सामग्री देखने के मामले में भारतीय छठे स्थान पर हैं। क्या यहां सरकारें आम आदमी की सुनती हैं? पासपोर्ट के लिहाज से हम ताकतवर की श्रेणी में नहीं आते। बस इस बात को लेकर संतोष कर सकते हैं कि वह ठीक-ठाक स्थिति में है, लेकिन इतना ठीक नहीं कि दुनिया हमारे लिए फूलों का हार लेकर बैठी हो।

मेरा सवाल यह है कि जब ये सभी बुराइयां पाकिस्तान में उसी तरह मौजूद हैं जैसे कि भारत में हैं, तो फिर कैसा इस्लामी राष्ट्र? अगर ये ज्यों की त्यों हैं तो आपने 75 सालों में क्या किया? किसी कौम के लिए यह इतना लंबा अरसा कम नहीं होता। मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं कि मेरे पाकिस्तानी मित्र जिसे इस्लामी राष्ट्र कहते हैं, वह वास्तव में एक विफल राष्ट्र है। अगर इन्हें अपने हालात बेहतर करने हैं तो अच्छी नीतियों के साथ सेकुलरिज्म (सभी धर्मों के प्रति आदरभाव) अपनाना ही होगा वरना मामला ऐसे ही चलता रहेगा, और कोई इलाज नहीं है।

भारत में ये सभी खराबियां मौजूद हैं, बल्कि ज्यादा आबादी के कारण बहुत बड़े स्तर पर मौजूद हैं। इसके बावजूद भारत ने कई क्षेत्रों में पाकिस्तान से ज्यादा प्रगति की है तो इसका श्रेय यहां के सेकुलरिज्म को दिया जाना चाहिए। अगर हम हिंदू राष्ट्र होते तो हमारे हालात बदतर होते।

सेकुलरिज्म के साथ जो चीज मायने रखती है, वह सरकार की नीति है। अगर हमारी नीतियां कुछ बेहतर होतीं तो हम और आगे होते। चीन हमसे बहुत आगे है, जिसकी सबसे बड़ी वजह वहां धार्मिक कट्टरपंथ को पनपने नहीं देना और प्रभावशाली नीतियों का होना है। कल्पना करें, अगर चीन धार्मिक राष्ट्र होता तो क्या इतनी प्रगति कर पाता? कभी नहीं।

हम धार्मिक राष्ट्र की बात करते समय जिस चीज को भूल जाते हैं, वह है लोगों का चरित्र। क्या वह इतना उज्ज्वल बन गया है कि धर्म के सभी सिद्धांतों पर खरा उतरे? याद रखें, सिर्फ पूजा-पाठ, नमाज, प्रार्थना, तीर्थयात्रा, हज कर लेना काफी नहीं है। अभी हमें लालच को जीतना है। हृदय से ईर्ष्या को दूर करना है। झूठ, कपट, वासना पर विजय प्राप्त करनी है। अपने मन पर इतना नियंत्रण पाना है कि वह अकेले में पराई दौलत का ढेर पाने से भी नहीं डिगे। हमारी जुबान ऐसी बन जाए कि वह किसी का दिल न दुखाए, जब बोले तो भली बात ही बोले। लोगों के मन में हर किसी के लिए दयाभाव पैदा हो जाए। जो अन्याय न करे, किसी का हक न मारे। ऐसे लोग ही किसी धार्मिक राष्ट्र के संचालन के अधिकारी हो सकते हैं। जहां ये नहीं होते, वहां धर्म के नाम पर लूटमार, व्यभिचार, बदमाशी का बाजार गरम रहेगा, इंसानियत हर रोज सिसक-सिसक कर दम तोड़ेगी।

इसलिए अभी हर तरह के धार्मिक राष्ट्र से बचें। अभी हमारी प्राथमिकता ऐसे इन्सान बनाना होनी चाहिए जिनमें ये तमाम खूबियां मौजूद हों। इसमें पांच हजार साल लगें या पचास हजार साल या उससे ज्यादा, उस उच्च आदर्श को प्राप्त करें। अभी पूरा जोर इन्सान का चरित्र बनाने पर लगाएं। तब तक धार्मिक राष्ट्र का नाम ही न लें और लोकतंत्र अपनाए रखें, उसमें सुधार तथा सबके साथ मेलजोल की गुंजाइश तलाशते रहें। अभी हम उस स्तर तक नहीं पहुंचे हैं जहां धार्मिक राष्ट्र चलाने के काबिल लोग भरपूर संख्या में हों। हमें इसके लिए बहुत लंबा सफर तय करना है। खुद को धीरे-धीरे उच्च आदर्श की स्थिति तक लेकर जाना है। उस सफर की तैयारी करें। जो इस तैयारी के बिना ही धार्मिक राष्ट्र की नींव रखेगा, यकीन मानिए उसकी हालत ऐसी होगी जैसे डूबती नाव और अनाड़ी के हाथ में पतवार।

इन्सान कमजोर पैदा किया गया है। (देखिए क़ुरआन 4/28) इसलिए अभी हमारा लक्ष्य अपनी कमजोरियां (विशेष रूप से मन की कमजोरियां) दूर करना होना चाहिए।

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