.. राजीव शर्मा ..

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से सम्बद्ध पत्रिका पांचजन्य ने अमेरिकी कंपनी अमेज़न पर कवर स्टोरी करते हुए इसे आड़े हाथों लिया और ईस्ट इंडिया कंपनी 2.0 करार दिया है। वही ईस्ट इंडिया कंपनी जो भारत आई थी कारोबार करने और बाद में यहां की कमियों का फायदा उठाकर 'मालकिन' बन गई।  

क्या अमेज़न और इस श्रेणी की दूसरी बड़ी कंपनियां भविष्य में वह सब कर सकती हैं जो कभी ईस्ट इंडिया कंपनी ने किया था? चलें, वैसा न सही, क्या ये इतनी ताकतवर हो सकती हैं कि छोटे दुकानदारों का रोजगार खा जाएं?

भूल जाइए एक बार आरएसएस, पांचजन्य, भाजपा और सभी संगठनों को और आज से दस साल पहले के जमाने को याद कीजिए। तब बड़े दफ्तरों में ही इंटरनेट हुआ करता था। मोबाइल फोन तो लोगों के पास था लेकिन उसमें आज जितना तामझाम नहीं होता था। हमारे मोहल्ले में बहुत कम लोग थे जो ऑनलाइन खरीदारी करते थे। कभी-कभार मैं इससे किताबें खरीद लेता था। हर कोई पैसा नकद ही देता था। बिजली, पानी, फोन के बिल लाइन में लगकर जमा करवाते थे।  

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फिर जियो आया। लोगों में एकदम से क्रांतिकारी टाइप फीलिंग आ गई। वॉट्सऐप पर धड़ाधड़ जुड़ने लगे। साइबर कैफे के प्रति आकर्षण घटने लगा, हर हाथ में स्मार्टफोन नजर आने लगा। स्मार्टफोन और इंटरनेट के संयोग ने हमारी कई आदतों को बदलना शुरू कर दिया। जैसे- नोटबंदी के बाद ऑनलाइन पेमेंट में उछाल आया, लोग बिजली, पानी, रसोई गैस आदि के बिल ऑनलाइन जमा कराने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगे, ऑनलाइन खरीदारी तेजी से बढ़ने लगी, ऑनलाइन बैंकिंग ने मोबाइल फोन को बटुआ ​बना दिया। अब कहीं जाने की जरूर नहीं, आप घर बैठे ही बस, रेल, हवाईजहाज का टिकट बुक करवा सकते हैं। कोरोना काल में विद्यार्थियों ने इंटरनेट की मदद से घर बैठे पढ़ाई की। बड़े-बुजुर्गों ने भजन-प्रवचन सुने।  

वहीं, हर कोई मोबाइल में खोया रहने लगा, लोगों के पास परिवार से बात करने के लिए समय नहीं लेकिन न्यूयॉर्क, लंदन में बैठे अनजान चेहरों से गपिया लेते हैं। तलाक हो रहे हैं, परिवार टूट रहे हैं। दिनभर सोशल मीडिया और गेम्स में व्यस्त रहने से बच्चों की पढ़ाई चौपट हो रही है। सांप्रदायिकता का जहर घुलता जा रहा है। युवा पीढ़ी पूरा मन लगाकर अश्लील सामग्री देख रही है।

और यह सब सिर्फ एक दशक में हुआ जिसमें पिछले पांच साल (2016-2021) अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। अभी तो यह शुरुआत है। देखते जाइए आगे क्या-क्या होता है। वास्तव में इंटरनेट ने सुविधा और दुविधा दोनों दी हैं। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जो इससे प्रभावित नहीं हुआ या भविष्य में नहीं होगा। लेकिन समाज में जिस तरह के बदलाव आ रहे हैं, उससे लगता यही है कि फायदे ज्यादा हैं तो नुकसान भी कम नहीं हैं।  

मैंने हाल में उत्तर-पूर्व के राज्यों पर आधारित एक पत्रिका पढ़ी। कोई दो साल पुराना अंक होगा, शायद 2019 का। उसमें एक मॉल के मालिक ने कहा कि पहले क्रिसमस और नए साल पर खूब बिक्री होती थी। लोग मोबाइल फोन, इलेक्ट्रॉनिक सामान, तोहफे, कार्ड वगैरह खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी रखते थे। जबसे यह ऑनलाइन शॉपिंग का ज़माना आया है, बिक्री घटती जा रही है, किसी तरह कर्मचारियों की तनख्वाह और बिजली-पानी का खर्चा ही निकल रहा है।  

यह सिर्फ एक झलक ​है। आप ऐसे दूसरे कारो​बारियों से पूछकर देख लें, सबकी कहानी एक जैसी ही मिलेगी ... कुछ साल पहले धंधा ठीक था, अब वैसी कमाई नहीं रही, जबकि खर्चे बढ़ते जा रहे हैं। कोरोना ने तो कमर ही तोड़ दी।

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पांचजन्य ने जो लिखा, बहुत लोग उससे सहमत होंगे और बहुत नहीं भी होंगे। सबको स्वतंत्रता है लेकिन इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि एक दशक में इंटरनेट ने हमारी ज़िंदगी को जबरदस्त तरीके से प्रभावित किया है। कारोबार भी इससे अलग नहीं है। दुनिया के तौर-तरीकों में बदलाव आ रहा है। ऐसे में जरूरी है कि गांव-मोहल्लों के दुकानदार भी अपने तौर-तरीके बदलें। आने वाले सालों में इंटरनेट का दखल बढ़ेगा, कम नहीं होगा। आप इसे नहीं रोक सकते। इसलिए हर दुकानदार समय रहते 'संभल' जाए और नए तौर-तरीकों पर विचार करे।

चाहे आप गोलगप्पे बेचते हैं या किराने की दुकान चलाते हैं, दो चीजें अनिवार्य रूप से करें: 1. ऑनलाइन पेमेंट, 2. होम डिलिवरी। अगर संभव हो तो अपनी वेबसाइट भी बनवा लें और ऑनलाइन ऑर्डर लें या फिर फोन/वॉट्सऐप पर ही ऑर्डर लेकर ग्राहक के घर तक सामान पहुंचाएं। पूरे सामान की रेट लिस्ट तैयार कर ग्राहक को उपलब्ध ​कराएं। इसे फालतू चोंचलेबाजी न समझें। अगर आज नहीं करेंगे तो भविष्य में करना होगा।  

मुझे नहीं पता कि अमेजन की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से करना ठीक है या नहीं है लेकिन यह सच है कि हमारा देश अंग्रेजों का गुलाम बना तो सबसे पहली चोट हमारे कारोबार पर ही हुई थी। अंग्रेज न हमसे ज्यादा बहादुर थे और न उनकी तादाद हमसे ज्यादा थी। वे थोड़े-से लोग थे जिन्होंने सबसे पहले हमारे कारोबार उजाड़े। हमारी आर्थिक रीढ़ तोड़ी, फिर हम पर काबिज हो गए।  

'तो अब हम क्या करें? क्या अमेज़न जैसी कंपनियों के खिलाफ झंडा उठा लें और 'भारत छोड़ो' के नारे लगाएं?' नहीं, ऐसा करने की जरूरत ही नहीं है। बस उस दौर से मिले सबक को याद रखें, उसके मुताबिक काम करें। दुकानदार नई टेक्नोलॉजी अपनाएं और अपनी सेवा ग्राहक के दरवाजे तक ले जाएं। ग्राहक से अच्छा व्यवहार रखें, अड़ियल रवैया कभी न अपनाएं। समय के साथ नए व सकारात्मक बदलाव अपनाते रहें। ग्राहकों से सुझाव मांगे, उनकी शिकायतों को गंभीरता से लें। बोली में अक्खड़ता नहीं, मधुरता लाएं। होली, दीपावली, ईद, क्रिसमस, नया साल आदि मौकों पर ग्राहकों से सीधे संपर्क करें।

आपकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि अपने ग्राहकों को अमेरिका में बैठे अरबपतियों से बेहतर  जानते हैं। उस मोहल्ले, इलाके से ज्यादा परिचित हैं। बस इसके साथ टेक्नोलॉजी और नए तौर-तरीके जोड़ दें। इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है। चाहे आप कितने ही झंडे उठा लें, कितने ही पुतले फूंक दें और कितने ही धरने दें, कोई सरकार सुनवाई नहीं करने वाली।  

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इसलिए समय के साथ बदलाव स्वीकार करें, यही तरीका है। यह अहंकार न पालें कि हमारी तो 10 पीढ़ियां दुकानदारी कर गईं, हमें कौन हिला सकता है! आपकी गलती इस बात को लेकर रियायत नहीं देगी कि आपके पूर्वज महान थे।  

ग्राहक की वजह से आपका कारोबार है, आपके कारोबार की वजह से ग्राहक नहीं है। अगर आप उसकी पसंद के मुताबिक सामान/सेवा नहीं दे पा रहे हैं तो वह अमेज़न या कहीं और चला जाएगा। आप उसे नहीं रोक सकते और न कोई सरकार रोक सकती है।

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