.. राजीव शर्मा ..

हमारा धर्म कितना महान है?

हमारी संस्कृति कितनी प्राचीन है?

हमारी धार्मिक किताबें प्रेम व सद्भाव का कितना संदेश देती हैं?

ये सब वही जान सकता है जो इन किताबों को बहुत ध्यान से पढ़ता है। यह भी सच है कि आज न लोगों के पास किताबें पढ़ने के लिए ज्यादा समय है और न खास दिलचस्पी है।

कुल आबादी में से 2 प्रतिशत लोग भी नहीं होंगे जो पवित्र पुस्तकों के ज्ञान को जानकर उसकी सही-सही व्याख्या कर पाएं।

फिर अन्य समुदायों से हम यह उम्मीद क्यों करें कि वे हमारी किताबें पढ़ें और उनकी अच्छाइयों को स्वीकार करें?

हम कौन हैं, कैसे हैं, कितने अच्छे हैं ... यह सामने लाने के लिए सिर्फ 2 बातें जरूरी हैं:

1. हमारा अपने और अन्य समुदाय के लोगों के साथ कैसा बर्ताव है?

2. हम दुनिया को क्या दे रहे हैं?

एक बार भूल जाएं पुरानी बातों और इतिहास के सुनहरे दौर को। हमारे पूर्वजों ने सात सौ, हजार, चौदह सौ और दो हजार साल पहले क्या चीजें बनाईं, आज उसके लिए हमें सलाम करने कोई नहीं आएगा। तब की और आज की दुनिया में बहुत बदलाव आ गया है।

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असल सवाल यह है कि हम अब क्या कर रहे हैं, हम दुनिया को आज क्या दे रहे हैं! अभी दुनिया जिस तेजी से बदल रही है, उसमें बीते ज़माने की ही बातें करते रहना काम नहीं आएगा। अगर हम उस दौर पर मुग्ध रहेंगे, उसके रोमांस में खोए रहेंगे तो अपना ही नुकसान ही कर लेंगे।

हम अल्लाह/परमेश्वर को कितना याद करते हैं, कितनी बार उसका नाम लेते हैं, कितनी तीर्थयात्राएं करते हैं, कितने रोजे/उपवास रखते हैं ... ये हमारे और अल्लाह/परमेश्वर के बीच का मामला है। अगर हम इनमें अच्छा करेंगे तो अपने लिए ही अच्छा करेंगे। दुनिया को इससे क्या? हमारा बदला हमें ही मिलेगा। पूरी दुनिया मिलकर न तो उसे रेत के कण बराबर बढ़ा सकती है और न कुछ घटा सकती है।

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दुनिया अपने सौ काम छोड़कर हमारी किताबें पढ़ने तो नहीं बैठेगी। वह हमारा बर्ताव देखेगी। उसका सामना हमारी किताब के शब्दों से नहीं, हमारे आचरण से होगा। उसके लिए हमारे बारे में कोई धारणा बनाने के लिए इतना काफी है कि हम अपनों के बीच कैसे रहते हैं और अन्य समुदायों के बीच कैसे रहते हैं; हम धरती की भलाई, शांति, समृद्धि, खुशहाली में कितना योगदान दे रहे हैं। जो इन दोनों बातों पर गौर कर लें, उन्हें यह बताने की जरूरत ही न पड़े कि वे कितने अच्छे हैं। 

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