.. राजीव शर्मा ..

डॉ. भीमराव अंबेडकर जीवनभर जातिवाद, भेदभाव, छुआछूत जैसी कुरीतियों से लड़ते रहे। वे ज्ञानी और विचारक थे। प्रख्यात वकील थे। शिक्षा पर बहुत जोर देते थे। महिला सशक्तीकरण के प्रबल पक्षधर थे। जटिल रीति-रिवाजों, फिजूलखर्ची के विरोधी थे। विभिन्न धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन गंभीरता से करते थे।

हम सब जानते हैं कि इस्लाम जातिवाद को खारिज करता है। शिक्षा पर बहुत जोर देता है। भेदभाव, बिरादरीवाद, छुआछूत जैसी खराबियों के लिए क़ुरआन में कोई स्थान नहीं है। यह भी सच है कि क़ुरआन में महिलाओं के लिए अनेक अधिकारों का उल्लेख है जो अरब में पहले नहीं मिलते थे। रीति-रिवाजों को आसान बनाने की बात कही गई है, फिजूलखर्ची करने से सख्ती के साथ मना किया गया है।

ऐसी और भी खराबियां उस समय के भारतीय समाज का हिस्सा थीं जिनका तार्किक समाधान इस्लाम में मौजूद है। ध्यान दीजिए 'इस्लाम' में मौजूद है।

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डॉ. अंबेडकर ने जीवन के आखिरी दिनों में बौद्ध धर्म अपना लिया था। मैं भी बौद्ध धर्म की कई शिक्षाओं से बहुत प्रभावित हूं।

इस धर्म के अनुयायी भारत में तुलनात्मक रूप से कम हैं। वे तिब्बत, म्यांमार, श्रीलंका, जापान आदि में ज्यादा हैं।

जहां तक मेरी जानकारी है, भारत में लद्दाख में बहुत संख्या में बौद्ध हैं। वे अपनी संस्कृति से लगाव रखने वाले, बहुत शांतिप्रिय, देशप्रेमी हैं; सीधे-साधे लोग जो दुनिया की चकाचौंध से दूर रहते हैं। उनके प्रार्थनास्थल बहुत ही सुंदर हैं। अगर मुझे अवसर मिला तो जीवन में एक बार लद्दाख के बौद्ध मठ और प्रार्थनास्थल देखने जरूर जाना चाहूंगा।

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मेरा प्रश्न है, 'डॉ. अंबेडकर इतने बड़े विचारक, तर्क को प्रधानता देने वाले तथा उच्च कोटि के चिंतक थे; उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया, इस्लाम क्यों नहीं?' यह प्रश्न कई दिनों से मेरे मन में था। क्या आपने कभी इसके बारे में सोचा है? कृपया यहां टिप्पणी कर मेरा ज्ञानवर्द्धन कीजिए।

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