(गौरव सैनी)

नयी दिल्ली, 23 मई (भाषा) दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा पांच साल तक किए गए विस्तृत अध्ययन के बाद राष्ट्रीय राजधानी में पाए जाने वाले सांपों की सूची में आठ और प्रजातियों को जोड़ा गया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय के पर्यावरण अध्ययन विभाग के शोधकर्ता गौरव बरहादिया ने कहा कि इसके साथ ही राजधानी में सांपों की प्रजातियों की संख्या बढ़कर 23 हो गई है। इसके साथ ही ‘फॉना ऑफ दिल्ली’ किताब में 1997 की उल्लेखित सूची को अद्यतन कर दिया गया है जिसका इस्तेमाल दिल्ली में जीवों की प्रजातियों का पता लगाने के लिए किया जाता है।

अध्ययन में 23 प्रजातियों और नौ समूहों में 329 सांपों को शामिल किया गया। सांपों की नयी प्रजाति में ब्रॉन्जबैक ट्री सांप, ट्रिंकेट सांप, कैट सांप, वोल्फ सांप, कुकरी, स्ट्रीक्ड कुकरी, सैंडबोआ और सॉ-स्केल्ड वाइपर शामिल हैं।

यह अध्ययन अमेरिकी पत्रिका ‘‘रेप्टाइल्स एंड एम्फीबियंस’’ में प्रकाशित हुआ है। इसमें जनवरी 2016 से अक्टूबर 2020 के बीच दिल्ली के सभी 11 जिलों में विभिन्न शहरी जंगलों, पार्कों, निजी बगीचों, खेतों, खाली प्लॉट, झील और जल निकायों में 376 फील्ड सर्वेक्षण किए गए।

इस अध्ययन के नतीजे पिछले महीने जारी किए गए।

इस अध्ययन की निगरानी करने वाले पर्यावरण अध्ययन विभाग के प्रोफेसर डॉ. चिराश्री घोष ने कहा कि शहरी जैव विविधता को दस्तावेज का रूप देने की तत्काल आवश्यकता है क्योंकि शहरी पुष्प और जीव जैव विविधता पर ताजा आंकड़ों का उचित रूप संकलन और प्रलेखन नहीं किया गया।

घोष ने कहा कि दिल्ली वन्य जीव संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण स्थल है क्योंकि इसमें रिज के रूप में प्राचीन अरावली पर्वतों की आखिरी श्रृंखला है जो अब शहरी जंगलों या शहरी पार्कों के रूप में बंट गयी है और घरों, बगीचों और औद्योगिक इलाकों में या उसके आसपास आए दिन सांप देखने को मिलते हैं।

बरहादिया ने कहा कि दुर्भाग्यपूर्ण रूप से दिल्ली में स्तनधारियों जंतुओं और पक्षियों जैसे अन्य समूहों के मुकाबले में सांपों को कभी प्राथमिकता नहीं मिली। इसी के चलते राजधानी में सांपों की मौजूदगी पर कोई महत्वपूर्ण अध्ययन प्रकाशित नहीं हुआ।

उन्होंने कहा, ‘‘हमें जितने भी सांप मिले उनमें से ज्यादातर विषैले और हानिकार नहीं थे और इसलिए लोगों को डरना नहीं चाहिए और उन्हें मौके पर ही मारना नहीं चाहिए। शहरी दिल्ली में सांपों की प्रजाति को सड़क पर मारे जाने, जानकारी की कमी, रहने के तौर-तरीके में बदलाव और रहने की जगह तोड़ने से मुख्य खतरा है।’’