भाद्र पद मास की शुक्ल पक्ष की तृतिया को हरितालिका तीज का व्रत मानाया जाएगा. 21 अगस्त को उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र सिद्ध योग व तैतिल करण तथा कन्या राशि के चन्द्रमा की साक्षी में यह महापर्व आ रहा है. पौराणिक मान्यता के अनुसार देखें तो इस व्रत की प्रक्रिया सौभाग्यवतियों के सौभाग्य को बढ़ाने वाली तथा कुंवारी कन्याओं के लिये सुन्दर, सुशील, सच्चरित्र पति की प्राप्ति के लिए किया जाता है.

ज्योतिषाचार्य पं अमर डब्बावाला ने बताया कि हरितालिका अर्थात हरि की आज्ञानुसार हर की पूजन की परम्परा माता पार्वती के द्वारा स्थापित की गई है. नारद पुराण व शिव महापुरारण में इस व्रत की विधि का विशेष उल्लेख बताया जाता है. कहा जाता है कि यह व्रत जन्म जन्मान्तर में किये गए पुण्य फल के प्रतिरूप सौभाग्य को निरन्तर बनाये रखने का आज्ञा फल है. शास्त्रों में इस व्रत की विधि कथा तथा उपवास की प्रक्रिया उल्लेखित की गई है. जिसमें व्रत करने वाले सुहागन महिला या कुंवारी कन्या संकल्प लेकरके शिव पार्वती का मृतिका के रूप में मूर्ति संयोजन करते हैं तथा पूर्व दिशा में स्थापित कर पंचांमृत पूजन द्वारा पीठिका पर स्थापित करते हैं. साथ ही यथा श्रद्धा शिव पार्वती विवाह प्रसंग का श्रवण कर्म किया जाता है.

इस दिन कुंवारी कन्याएं निराहार रहकर मध्य रात्रि तक जागरण कर शिव पार्वती के भजन का कार्य श्रद्धा तथा प्रसन्नता के साथ संपादित करती है. मान्यता है की ऐसा करने से सौभाग्यवतीयों का सौभाग्य चिर काल तक स्थिर रहता है. तथा कुंवारी कन्याओं को मनोवांछित पति की प्राप्ति होती है.

उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र और सिद्ध योग में मनाया जाएगा ह​रतालिकातीज का पर्व

इस बार संयोग से अधिक मास के कारण नक्षत्र मेखला की गणना से उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में इस महापर्व का उत्सव मनाया जायेगा. भारतीय ज्योतिष शास्त्र में नक्षत्र गणना के अनुक्रम से देखें तो उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र कार्य की सफलता का पूर्ण नक्षत्र बताया जाता है. क्योंकि मुहूर्त चिंतामणि में तीन नक्षत्र विशेष बताये जाते हैं जिनमें उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा व उत्तराभाद्रपद ये तीन नक्षत्र ऐसे हैं जो कार्य की सिद्धि के साथ-साथ संकल्पों को सफल करते हैं.

इसी दिन सिद्ध योग का भी संयोग है जो 27 योगों में खास माना जाता है. इस योग में भी उपासना का पर्व संकल्प विशेष को सिद्ध करता है. इस दृष्टि के पंचांग के पाँच अंगों क्रमशः वार, तिथि, योग, नक्षत्र, करण जब उत्तरोत्तर प्रबल हो तो वह पर्वकाल समृद्धि, सफलता, खुशहाली व दीर्घायु देकर के जाता है इस दृष्टि से यह व्रत अवश्यमेव करना चाहिए.