.. राजीव शर्मा ..

किसी दार्शनिक ने कहा था कि 'इतिहास को मत मिटाओ वरना इतिहास तुम्हें मिटा देगा।' मैं कोई इतिहासकार नहीं हूं। उसे पढ़ने, समझने, सीखने की मेरी दृष्टि औरों से कुछ अलग है। अगर मैं इतिहास पढ़ूंगा तो उसे किसी श्रद्धा के विषय के तौर पर नहीं, बल्कि यह जानने के लिए पढ़ूंगा कि उस समय क्या-क्या हुआ था।

भारत में मुगल काल के बारे में काफी कुछ लिखा जाता है। कोई उनका अंध प्रशंसक है तो यही कहेगा कि 'उससे बेहतर ज़माना न कभी हुआ, न होगा। काश कि वह लौट आए!' इसी तरह बहुत लोग मुगलों का नाम तक सुनना पसंद नहीं करते। वे हर समस्या के का ठीकरा मुगलों के सिर फोड़ते हैं।  

मेरा मानना है कि इतिहास एक ऐसा दस्तावेज होना चाहिए ​जो ईमानदारी से बताए कि उस ज़माने में क्या हुआ, उन लोगों में क्या खूबियां थी, क्या खामियां थीं, उनके फैसलों में ऐसी क्या बात थी कि एक क्षण वे छा गए और दूसरे ही क्षण धराशायी हो गए?

हम भारतीयों के साथ बड़ी दिक्कत है कि हम अपनी धार्मिक मान्यता को हर जगह लेकर आ जाते हैं। हम इतिहास में भी श्रद्धा ढूंढ़ने लगते हैं। इतिहास को इतिहास के तौर पर पढ़ना ही नहीं चाहते। यह ठीक नहीं है। इससे हमें बड़ा नुकसान है। हम बार-बार उन्हीं गलतियों को दोहराते जा रहे हैं ​जो कभी हमारे पूर्वज किया करते थे।

इतिहास होता ही इसलिए है ताकि उससे सबक लेकर भविष्य को बेहतर बनाया जा सके। हम वह सब पढ़ें, जानें जो अतीत में हुआ था। फिर उससे कुछ सीखकर भविष्य को सुधारें। हर चीज को धर्म और श्रद्धा से जोड़ने का फायदा तो कुछ नहीं होगा, अलबत्ता भविष्य को जरूर तबाह कर लेंगे।

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इतिहास को ईमानदारी से पढ़ना और पढ़ाना चाहिए। कोरी वाहवाही या कोरी निंदा हमें फायदा नहीं पहुंचा सकतीं। दोनों पक्ष सामने आने चाहिए। फिर चाहे मुगल हों या अन्य शासक और नेता, उनके सकारात्मक और नकारात्मक पक्षों का ईमानदारी से उल्लेख किया जाना चाहिए, जिससे हम भविष्य में उन गलतियों से बच सकें ​जो हमसे या हमारे पूर्वजों से हुई थीं।  

मुगलों के राज में ऐसी बहुत-सी चीजें हुईं जो अच्छी कही जा सकती हैं। इसी प्रकार ऐसी अनगिनत चीजें हुईं जो बहुत बुरी कही जा सकती हैं। यही बात ब्रिटिश हुकूमत के दौर पर लागू होती है। मैं इसके कुछ उदाहरण देता हूं।

अगर मुगल राज की इमारतें देखें तो पता चलता है कि उन्होंने कितना ठोस काम कराया। मैं उनके नामों का जिक्र नहीं करूंगा वरना फिर नई बहस शुरू हो जाएगी कि फलां का तो नाम बदला गया था!  

आप उस जमाने की कोई पांच चर्चित इमारतें देख लीजिए। वे आज भी शान से खड़ी हैं, जबकि 1947 से लेकर आज तक कितने ही सरकारी पुल, इमारतें, मकान ऐसे बने जो कुछ समय बाद ध्वस्त हो गए। कई तो पहली बारिश नहीं झेल पाए। जिधर देखो, उधर मिलावट, भ्रष्टाचार।  

मुगलों में और कमियां रही होंगी लेकिन उनका निर्माण तंत्र उतना भ्रष्ट नहीं रहा होगा जितना कि आज हमारा है। इसी तरह अंग्रेजों ने भी जबरदस्त निर्माण कराए। उनकी बिछाईं पटरियों पर आज तक हमारी ट्रेनें सरपट दौड़ रही हैं। बेशक उन्होंने यह सब अपने फायदे के लिए किया था, पर अपने कौमी हितों के लिए वे हमसे ज्यादा ईमानदार थे।

यह कहना पूरी तरह गलत होगा कि मुगल राज में सबकुछ अच्छा ही अच्छा हुआ। आम आदमी की स्थिति तब भी खराब ही थी। अगर मानवाधिकारों के लिहाज से देखा जाए तो अत्याचार की घटनाएं होती रहती थीं। लोगों के पास आज जितने अधिकार नहीं थे।  

मुगल शासकों ने सिखों से टकराव लेकर बड़ी भूल की थी। इसे टाला जा सकता था। अकबर इस बात को समझता था। औरंगजेब के जाते-जाते मामला हाथों से निकल चुका था। फिर यह वंश ज्यादा समय तक अपनी सत्ता कायम नहीं रख पाया।  

हिंदू राजाओं के शासन में भी जुल्म की अनगिनत घटनाएं मिलती हैं। राजा मनमानी सजाएं देते थे। गढ़, किले बनवाने के लिए लोगों से खूब काम लिया जाता था। सत्ता के लिए बहुत लड़ाइयां होती थीं जिनकी कीमत प्रजा अपनी जान और ज्यादा लगान देकर चुकाती थी। जिसकी लाठी, उसकी भैंस होती थी। अपने बुजुर्गों से पूछिए कि 1947 से पहले आम लोगों खासतौर से दलितों के साथ राजा-महाराजाओं का बर्ताव कितना गरिमापूर्ण, मिलनसार होता था।  

उस दौर की कुछ तस्वीरें गूगल पर सर्च कर सकते हैं। आम आदमी हमेशा दुखी ही था, फिर चाहे राजाओं की सत्ता हो या मुगल बादशाहों की। कोई ज़माना ऐसा नहीं जिसमें जुल्म नहीं हुआ। वे शासक थे और अपनी सत्ता बचाने के लिए उचित-अनुचित सब करते थे। अगर 200 साल पहले राजा-बादशाह ऐसे थे तो 1,000 साल पहले कैसे रहे होंगे? उस समय सोशल मीडिया नहीं था, कैमरे नहीं थे, अखबार नहीं थे, इसलिए हमें कुछ ही बातें पता हैं। तो ज्यादा भावुक होने की जरूरत नहीं है।

अब अंग्रेजों की बात कर लेते हैं। बादशाह जहांगीर अपनी बेटी के इलाज के बाद उसकी सेहत में सुधार से खुश होकर अंग्रेज टॉमस रो को सोने से तोलना चाहता था, लेकिन उसने इनाम में सोना लेने के बजाय अपनी कौम के लिए कारोबार का लाइसेंस मांगा। फिर अंग्रेज भारत पर काबिज हुए और क्या-क्या हुआ, आप सब जानते हैं।

अगर वहां हममें से कोई होता तो ज्यादा चांस इस बात के हैं कि सोना लेकर चुपचाप निकल जाता। बीवी या गर्लफ्रेंड के लिए गहने बनवा लेता, दुकान खोल लेता, मकान बनाता, गाड़ी लेता (रथ), गोवा जाकर मस्ती करता (पता नहीं तब लोग गोवा जाते थे या नहीं), ताशपत्ती खेलता। कोई चिलम, दारू का नशा पाल लेता।  

जब हमारे लोग 'तेरी-मेरी' में व्यस्त थे तब अंग्रेज कौम अपने हितों को लेकर आगे बढ़ रही थी। अंग्रेज कोई बहुत बड़े वीर थे, यह मैं बिल्कुल नहीं मानता। हां, इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता कि हमारे बड़े-बड़े राजा उनके दरबारों में हाजिरी देते थे।, उनके आदेश पर लड़ने-मरने को तैयार हो जाते थे। मुट्ठीभर अंग्रेजों ने हमारे ही सैनिकों के दम पर यहां शासन किया था।  

विज्ञान को लेकर अंग्रेजों का नजरिया हमेशा सकारात्मक रहा। वे 1857 की क्रांति को दबाने में सफल रहे ​जिसमें दूरसंचार यंत्रों का बड़ा योगदान रहा है। उन्होंने इसका फायदा उठाया। जबकि हमारे पुरखों का नजरिया ​विज्ञान को नकारने वाला ही रहा है। फिर बात चाहे प्रिंटिंग प्रेस के खिलाफ फतवे की हो या ट्रेन यात्रा करने पर जाति से बहिष्कृत करने की। हम लोग खासतौर से हिंदू और मुसलमान अपनी कमियों की वजह से गुलाम बने। वे कमियां आज तक हमारे व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।  

अंग्रेज कोई ऐसे शासक नहीं थे कि जिनके दिलों में दया का सागर हिलोरे मार रहा हो। उन्होंने जमकर बेरहमी की, लूटमार मचाई, अपने खिलाफ उठती आवाज को दबाया, बेशुमार फांसियां दीं। जलियांवाला कांड अंग्रेज ने ही किया था, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि वहां गोलियां चलाने वाले हाथ हमारे अपनों के ही थे।

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यहां बर्बरता और बेरहमी के कारनामे दोहराने वाले अंग्रेज अपने देश (ब्रिटेन) में मानवाधिकारों, लोककल्याण, महिला सम्मान के मामले में हमसे कोसों आगे हैं। वहां की सड़कें शानदार हैं। सफाई बेमिसाल है। वहां सुबह लोटा लेकर पटरियों पर किसी को नहीं जाना पड़ता। अस्पतालों में इलाज बेहतरीन है। पानी के लिए नल पर सिरफोड़ी के दृश्य देखने को नहीं मिलते। दूध, दवा में मिलावट नहीं होती। जबकि हम हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी पर देशभक्ति के नारे लगाकर, अंग्रेजों को कोसकर इस बात की खुश मना रहे हैं कि देखो, हमने शौचालय बना दिए।  

शौचालय बनाना निश्चित रूप से स्वच्छता की दिशा में एक बड़ा कदम है, एक उपलब्धि है लेकिन  सोचने वाली बात यह है कि हम अब तक यहीं क्यों अटके हुए हैं? हमें तो बहुत आगे चले जाना चाहिए था। जाहिर है कि हमारी अपनी कमियां हैं ​जो हमें आगे नहीं बढ़ने दे रही हैं। हमें 2021 में भी अपनी नाकामियों का ठीकरा फोड़ने के लिए अंग्रेजों या मुगलों का सिर चाहिए। ऐसे लोग तमाम खूबियों के बावजूद तरक्की नहीं कर सकते। लिखकर ले लो, ऐसा ही रवैया रहा तो 100 साल बाद भी यही शिकायतें करते रहोगे।  

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