संगीत उन्हें विरासत में मिला. उनके पर-नाना बैजूबावरा और तानसेन के गुरु रहे हैं. यही नहीं मल्लिका-ए-गजल बेगम अख्तर ने उन्हें गले लगाते हुए कहा था, "भले ही मैं रहूं या न रहूं, लेकिन मेरे बाद जब लोग तुम्हें सुनेंगे तो मुझे याद करेंगे. " यहां बात हो रही है शास्त्रीय संगीत गायिका सुनीता झिंगरन की.

हुसैनी ब्राह्मण हैं सुनीता झिंगरन

लखनऊ से जुड़ीं और चार साल की उम्र से संगीत सीख रही सुनीता को हुसैनी ब्राह्मण (पैगंबर हजरत मोहम्मद के नवासे को दिल से मानने वाले ) के नाम से भी जाना जाता है. दरअसल, इमाम हुसैन (जिनकी शहादत और कुर्बानियों की याद में मुहर्रम मनाया जाता है) और उनके परिवार से उनकी मोहब्बत आवाज में दर्द के साथ बयां होती है.

वैसे हर साल की तरह इस बार भी मुहर्रम में उनके नौहे और सलाम सुनने की लोगों ने इच्छा जाहिर की है, लेकिन कोविड-19 के चलते वह अपने वीडियो ऑनलाइन ही भेज रही हैं.

कोविड-19 के चलते मुहर्रम पर दूसरे शहरों में नहीं जा पा रही हैं सुनीता

सुनीता ने कहा," मैं हर साल मुहर्रम में सलाम-मर्सिया पढ़ने के लिए दूसरे शहरों में भी जाया करती थीं, लेकिन इस बार कोरोना की वजह से घर से बाहर नहीं निकल पा रही. जो मेरे सलाम सुनना चाह रहे हैं, उनके रोज फोन आ रहे हैं. उनके लिए मैं ऑनलाइन वीडियो भेज रही हूं. अभी हाल ही में बेंगलुरु से फोन आया तो मैंने उन्हें तीन सलाम का एक वीडियो भेजा है. ये वक्त बहुत खराब चल रहा है, लेकिन हर रात की सुबह होती है. जल्द ही हम इस बीमारी से भी निजात पा लेंगे और खुशगवार सुबह देखेंगे. "

यह ज़मीं शब्बीर की यह आसमां शब्बीर का…

हिंदु ब्राह्म्ण होते हुए इमाम हुसैन और उनके परिवार से बेपनाह मोहब्बत करने के सवाल पर सुनीता यह शेर सुनाती हैं,

"आंख में उनकी जगह दिल में मकां शब्बीर का

यह जमीं शब्बीर की यह आसमां शब्बीर का

जब आने को कहा था कर्बला (इराक का एक शहर) से हिंद में

उसी रोज से हो गया हिंदुस्तां शब्बीर का"

सुनीता कहती हैं कि इमाम हुसैन किसी एक क़ौम के नहीं बल्कि हर क़ौम के हैं, तभी तो कहा है,

"इंसान को बेदार तो हो लेने दो, हर क़ौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन."

मुजफ्फर अली ने कहा था- आपकी आवाज के दर्द को मर्सिया और सलाम में आजमा कर देखो

सुनीता आगे बोलीं, मैं पिछले 27 सालों से मिर्सिया और सलाम पढ़ रही हूं. मैंने स्वर्गीय कारी हैदर हुसैन से बकायदा इसकी तालीम ली है. इस फन को सीखने का श्रेय बॉलीवुड डायरेक्टर मुजफ्फर अली को जाता है. उन्होंने मुझसे कहा था कि आपकी आवाज में जो दर्द है, उसे मर्सिया और सलाम में भी आजमा कर देखें. बस उनकी इस बात को मैंने दिल से लगा लिया था.

बेगम अख्तर से वो मुलाकात कभी नहीं भूल सकती

बेगम अख्तर से गुलुकारी की बारीकियां सीखने वाली सुनीता अपने और बेगम के रिश्ते की शुरुआत की दिलचस्प किस्सा कुछ यूं बयां करती हैं, मैं बेगम अख्तर की गायिकी की दीवानी थी. उनके गाने सुना करती थी और उनकी आवाज की नकल भी करती थी. पता नहीं कैसे कहीं से बेगम साहिबा ने मेरी आवाज सुन ली. उन्होंने पूछा कि यह कौन है, इसे मेरे पास लेकर आओ. एक सुबह उनके देवर हमारे घर आए और पिता जी से बोले कि सुनीता को बेगम साहिबा ने बुलाया है. यह सुनते ही पिता जी मेरे पास आए और बोले कि जिनसे मिलने के लिए, जिनसे बात करने के लिए तुम तरसती हो, उन्होंने खुद तुम्हे बुलाया है, चलो तैयार हो आओ. मेरे तो हाथ-पैर फूल गए थे, हम उनके घर पहुंचे तो उन्होंने मेरा नाम पूछा और मुझसे कहा कुछ सुना. मैंने जब उन्हें उन्हीं की गजल सुनाई तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया. उनकी आंखों में आंसू थे और वह बोली कि जब मैं न रहूंगी और लोग तुम्हें सुनेंगे तो मुझे जरूर याद करेंगे.