.. राजीव शर्मा ..

श्रीकृष्ण के अनेक रूप हैं। गाय चराते, बांसुरी बजाते, गुरुकुल में अध्ययन करते और कुरुक्षेत्र में गीता का ज्ञान देते ... मुझे तो उनका हर रूप अद्भुत लगता है। उनके जिक्र में सुकून है, उनके शब्दों में शक्ति है।

हर किसी के लिए कृष्ण के मायने अलग हो सकते हैं। अगर मुझे उनके लिए सिर्फ एक शब्द लिखना हो तो मैं लिखूंगा 'मार्गदर्शक'। उनके वचन और कर्म में हमारे लिए मार्गदर्शन और सबक हैं।

मैंने कृष्ण-सुदामा की कथा तो कई बार पढ़ी लेकिन उसे हकीकत में तब महसूस किया जब थोड़ी समझ आई। सुदामा का जीवन बहुत सादा था। ज्ञानी तो थे पर गरीब रह गए। यह एक 'दोष' उनके गुणों पर भारी था। जेब खाली थी तो पड़ोसी सम्मान नहीं करते थे। मौका मिलता तो ताने मारते, व्यंग्य करते। टूटी-फूटी झोपड़ी में रहते तो रिश्तेदार भी दूर ही रहना पसंद करते थे।

एक दिन सुदामा की पत्नी ने उन्हें कहा कि अपने मित्र द्वारिकाधीश श्रीकृष्ण के पास जाइए। संभवत: वे आपकी कुछ मदद कर दें!

सुदामा के पास थोड़े-से चावल थे। वे उन्हें ही पोटली में बांधकर चल पड़े। कृष्ण का महल देखकर सुदामा मन ही मन संकोच महसूस कर रहे थे लेकिन कृष्ण तो कृष्ण थे। उन्होंने बहुत बड़ा दिल दिखाते हुए मित्र का स्वागत किया, चरण धोए और वहां बैठाया जहां वे खुद बैठते थे। खुद रूखे-सूखे चावल खाए, मित्र को दौलत, आलीशान घर का मालिक बना दिया।

मैं पहले भी कई बार लिख चुका हूं कि इस प्रसंग से हमें यह सबक लेना चाहिए कि गरीबी बहुत बड़ा अभिशाप है। अगर इन्सान नेक हो और उसके पास रुपया नहीं तो समाज, रिश्तेदार उसे सुख से जीने नहीं देंगे।  

कृष्ण चाहते तो सुदामा से कह सकते थे कि 'यार सुदामा! धन लेकर क्या करेगा? जीवन का मजा तो गरीबी में ही है, सो तू गरीब ही रह। इसी में भलाई है।'

नहीं, उन्होंने सुदामा को गरीबी से निकाला क्योंकि वे जानते थे कि अगर कोई इन्सान नेक है तो गरीबी उसके मान-सम्मान, गरिमा के लिए सबसे बड़ी दुश्मन है। उसे गरीबी की वजह से कदम-कदम पर जिल्लत उठानी पड़ेगी।  

मैंने सुदामा की व्यथा को स्कूली दिनों में ही महसूस कर लिया था। उससे पहले मैं नैतिक शिक्षा की किताबें पढ़कर यह मानता था कि संसार में वही व्यक्ति बड़ा माना जाता है जो सच्चा है, जो मेहनती है, जो ईमानदार है, जो दूसरे का हक नहीं मारता, जो सदाचारी है, जो किसी का बुरा नहीं चाहता, बुरा नहीं करता, जो अच्छी किताबें पढ़ता है आदि।

जब मैं सातवीं कक्षा तक पहुंचा तो मेरे ये भ्रम टूटने लगे। मैं यह नहीं कहता कि मुझमें कोई दोष नहीं है लेकिन मैंने हमेशा सच बोलने की कोशिश की, मुझमें कामचोरी कभी नहीं रही, हमेशा ज्यादा से ज्यादा मेहनत की, एक रुपया भी किसी का बेईमानी से नहीं खाया, किसी को धोखा नहीं दिया, न किसी के साथ अन्यायपूर्वक आचरण किया। इन सबके बावजूद मैंने पाया कि मेरे ही समाज में मेरी हैसियत एक मूर्ख से ज्यादा कुछ नहीं है।

मैंने इस बात को पूरी तरह झूठ पाया कि वही व्यक्ति बड़ा माना जाता है जो सच्चा होता है। बल्कि मेरा अनुभव यह रहा कि समाज हो या रिश्तेदार, यहां तक कि आपके पड़ोसी और परिवार के ही लोग, बड़ा वही माना जाता है जिसके पास धन होता है। अगर कोई व्यक्ति ईमानदार, सत्यवादी, सेवाभावी, परिश्रमी, सदाचारी है लेकिन उसके पास धन नहीं है तो सभी लोग मिलकर उसे सताते हैं।

मुझे अच्छी तरह याद है, एक बुजुर्ग अक्सर मुझे इस बात को लेकर बहुत ताने मारते थे कि तुम्हारे पापा की कमाई कम है ... क्या रखा है पढ़ाई में ... कोई काम-धंधा करो, मुझे खेत में काम कराओ ... तुम यूं ही ठोकर खाते फिरोगे।

मैं उनके शब्दबाण सहकर इसलिए खामोश रह जाता था क्योंकि उनकी उम्र का लिहाज करता था। आज न वे मुझे कुछ कह सकते हैं और न मुझे उनके यहां जाने में कोई दिलचस्पी है।

मैं यह नहीं कह रहा कि दुनिया में भलाई, सच्चाई, ईमानदारी का कोई महत्व नहीं है। इनका महत्व सदैव रहेगा। एक बेहतर समाज के लिए जरूरी है कि हममें ये बातें हों। लेकिन अगर आपको समाज में ज्ञान, भलाई, सच्चाई, ईमानदारी, वफादारी, मेहनत और तमाम खूबियों की कद्र करानी है तो अपना बटुआ खाली न रखें। उसमें आपकी मेहनत और ईमानदारी का पैसा होना ही चाहिए। जब वह भरा होगा तो ही पड़ोसी, समाज, रिश्तेदार आपकी कद्र करेंगे। खासतौर से लड़कियों के लिए यह अनिवार्य मानता हूं। उनके लिए दुनिया ज्यादा जालिम है। उन्हें इस काबिल बनना ही चाहिए कि रुपए-पैसे के मामले में किसी की मोहताज न रहें।

यही बात किसी देश पर लागू होती है। अगर हम चाहते हैं कि दुनिया हमारे देश का सम्मान करे, हमारे पासपोर्ट की कद्र करे तो जरूरी है कि देश समृद्ध हो। दुनिया न आज गरीब का सम्मान करती है, न पहले करती थी और न भविष्य में करेगी। गरीब को सब दुत्कारते हैं, धनवान से सब जान-पहचान बढ़ाना चाहते हैं; चाहे हमारा ज़माना हो या सुदामा का ... और कृष्ण जैसे मित्र बहुत सौभाग्य से ही मिलते हैं।

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