इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में रंजना अग्निहोत्री कोई अनजाना नाम नहीं हैं. राम मंदिर वाले केस में वह राम जन्मभूमि पुनरोद्धार समिति की ओर से वकील थीं. उनके लिए यह मुकदमा केस से कहीं ज्यादा था. रंजना बताती हैं कि अवध क्षेत्र में घर होने के कारण घर का माहौल राममय था.खैर, राम मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है. जिस दिन राममंदिर पर फैसला आया, उससे अगले दिन से ही उन्होंने मथुरा में श्रीकृष्णजन्मभूमि केस पर काम करना शुरू कर दिया था. मथुरा में जिला जज की अदालत ने श्रीकृष्णजन्मभूमि को लेकर याचिका स्वीकार कर ली है. याचिका में श्रीकृष्ण जन्मस्थान मंदिर के साथ ही बनी ईदगाह को हटाने की मांग की गई है. इसमें 13.37 एकड़ के भूमि के स्वामित्व की मांग की गई है. इसी मामले के लिए अदालत की लड़ाई लड़ रहीं रंजना अग्निहोत्री ने Opoyi से खास बातचीत में इस केस को लेकर बारीकी से समझाया.

सवाल-कुछ लोग कहते हैं कि रामजन्मभूमि तो मामला बनता था, ये तो कोई विवादित मामला है ही नहीं, मंदिर अलग है और मस्जिद अलग. क्या आप इस मामले को विस्तार से बताएंगी?

जवाब- ये विवाद रामजन्मभूमि से सरल है. 1618 में ओरछा के राजा वीर सिंह बुंदेल इस भूमि पर 33 लाख रुपये लगाकर भव्य श्रीकृष्ण मंदिर का निर्माण करवाया था. इसके बाद 30 जुलाई 1658 को औरंगजेब सत्ता में आए.1669 में औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने का फरमान निकाला. इसके साथ ही ये भी कहा कि मंदिर तोड़ने के बाद इसकी मूर्तियों का इस्तेमाल जहांआरा मस्जिद की सीढ़ियों के लिए किया जाए ताकि लोग मूर्तियों को पैरों में रौंदते हुए चलें. इसी फरमान की कॉपी हमने कोर्ट में लगाई है. फरमान की कॉपी इतिहासकार जदुनाथ सरकार की लिखी किताब में भी है. इसके साथ ही हैदराबाद के म्यूजियम में भी इसी फरमान की कॉपी मौजूद है.

सवाल - औरंगजेब ने मंदिर तोड़ दिया था. वर्तमान की बात करें तो यहां मंदिर और मस्जिद एक साथ हैं. ये कैसे संभव हुआ?

जवाब- 7 अप्रैल 1770 को मराठों और औरंगजेब की सेना के बीच गोवर्धन का युद्ध हुआ था. इसमें मराठों ने औरंगजेब की सेना को बुरी तरह खदेड़ दिया था. औरंगजेब ने यहां पर एक स्ट्रक्चर बनाया था, उसे भी मराठों ने तोड़ दिया था. इसके बाद 1803 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस स्थान को सरकारी जमीन घोषित कर दिया. 1815 में अंग्रेजों ने इस 13.37 (श्रीकृष्ण जन्मभूमि) एकड़ जमीन की नीलामी की. उस समय बनारस के राजा पटनीमल ने इसे खरीद लिया. 1860 में एक सेटलमेंट मैप बनाया गया. ये जमीन कटरा केशव देव के नाम से चढ़ गई. राजा पटनीमल ने सोचा था कि श्रीकृष्ण के बड़े मंदिर का निर्माण करेंगे, लेकिन इसी बीच उनकी मौत हो गई. इसके बाद जुगल किशोर बिड़ला ने ये जमीन राजा पटनीमल के वंशजों से 13 हजार 400 रुपये में खरीदी. इसकी सेल डीड उन्होंने भारत रत्न मदन मोहन मालवीय के नाम पर की. यह मदन मोहन मालवीय जी का ही सपना है. इस बीच मदन मोहन मालवीय जी का भी स्वर्गवास हो गया.

सवाल-ट्रस्ट का इसमें क्या रोल रहा. सुना है इसे लेकर भी विवाद है?

जवाब- जुगल किशोर बिड़ला ने 21 फरवरी 1951 को एक ट्रस्ट बनाया और इस ट्रस्ट का नाम श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट रखा गया.21 जनवरी 1953 को कुछ लोगों ने नया ट्रस्ट श्रीकृष्ण जन्म सेवा संस्थान बनाया. इन लोगों ने ईदगाह से जुड़े लोगों के साथ मिलकर केस फाइल कर दिया. जुगल किशोर बिड़ला जी का भी निधन हो गया. इन दोनों ने फर्जी कंप्रोमाइज किया. 1968 में कंप्रोमाइज करके उसे दाखिल कर दिया. उन्होंने कोर्ट को गुमराह करके फर्जी डिक्री ले ली. 1968 के बाद 13.37 एकड़ में से ढाई बीघा जमीन ले ली गई. उन्हें जहां कृष्ण का जन्म हुआ उसी कारागार का आधा हिस्सा दे दिया गया. ऐसे वहां मस्जिद बनाई गई.

आपको क्यों लगता है आपका केस मजबूत है?

यह केस हिन्दुओं की आस्था का तो है ही, लीगल प्वाइंट भी हम बहुत मजबूत हैं. कोर्ट को गुमराह करके फर्जी डिक्री ली गई. सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कोई इस तरह का फर्जी काम करता है तो पता चलने पर इसे किसी भी समय चैलेंज कर कैंसिल किया जा सकता है. जिला कोर्ट में हमारी अपील समिट हो गई है. कोर्ट ने इनसे अतिक्रमण वाला सवाल किया है.

इस मामले में आप कोर्ट से क्या-क्या चाहते हैं?

हम माननीय अदालत से यही चाहते हैं कि यह हिन्दुओं की आस्था का प्रश्न है. फर्जी तरीके से ये काम किया गया.मस्जिद को उस जगह से हटाया जाए, वह श्रीकृष्ण जन्मभूमि है.

ये आपके लिए सिर्फ एक मुकदमा नहीं है. क्या ये सही बात है?

जी, ये आस्था का प्रश्न भी है. हम भारत रत्न मदन मोहन मालवीय जी के सपने को साकार करने के लिए लड़ रहे हैं, जो उन्होंने भारतीयों की आन-बान और शान के लिए देखा था.

आप बेहद संवेदनशील मुद्दे पर केस लड़ रही हैं, आपको कोई धमकी या कोई खतरा महसूस नहीं होता?

धमकी के बारे में फिर किसी दिन बात करेंगे. रही डर की बात तो वह बिल्कुल महसूस नहीं होता. मैं अपना जीवन धर्म और राष्ट्र के नाम कर चुकी हूं.