हाल ही में नेटफ्लिक्स पर रिलीज हुई फिल्म 'गुंजन सक्सेना – द कारगिल गर्ल' में गुंजन के पिता अनूप सक्सेना का किरदार निभाने वाले पंकज त्रिपाठी का फिल्मी सफर आसान नहीं रहा. 8 हजार रुपए के लिए फिल्म 'रन' में दो सीन करने वाले पंकज को हर ऑडिशन में ‘नॉट फिट’ ही सुनने को मिलता था और आज 'मिर्जापुर' के कालीन भैया हों या फुकरे के पंडित जी, पंकज के लिए किरदार लिखे जा रहे हैं. पटना के छोटे से गांव से निकलकर बॉलीवुड के आसमान पर चमकने वाले नेशनल अवॉर्ड से नवाजे जा चुके पंकज ने कुछ दिलचस्प बातें शेयर कीं.

आठ साल पहले तो पत्नी की सैलरी से ही चलता था घर

पंकज ने बताया कि आज से आठ साल पहले मेरी स्थित कुछ और थी, लेकिन मैं असफलताओं में परेशान नहीं था.मुंबई में स्ट्रगल के दौरान मैंने घर से पैसे नहीं लिए, बल्कि होटेल में काम किया. उस वक्त जिसने मेरा सपॉर्ट किया, वह मेरी पत्नी थीं. वह टीचर थीं और उन्हीं की सैलरी हमारे लिए मुंबई में सहारा बनी. उस वक्त ढाई हजार रुपये देकर हम रेंट पर रहते थे. आज हमारे पास एक बड़ा घर है, जिसकी हर महीने तीन लाख ईएमआई जाती है. मुझे लगता है कि घर से ज्यादा दिल बड़ा होना जरूरी है. आठ साल पहले मैं एक फोन कॉल के लिए इंतजार करता था कि काश कोई फोन आ जाए और कोई रोल मिल जाए. आज हर दूसरी कॉल में ऑफर मिलता है.

आज मेरे पास काम की कमी नहीं है, लोग मुझे सफल कह रहे हैं तो इस बात का कोई घमंड भी नहीं है.मुझे मालूम है कि कुछ भी स्थायी नहीं है फिर वह चाहे असफलता हो या सफलता, यह एक चक्र है. हालांकि, अगर यह सफलता मुझे जल्दी मिल जाती तो शायद संभालना मुश्किल हो जाता. बगैर मेहनत के जब कोई चीज हासिल हो जाती है तब हम उसकी कीमत नहीं समझते हैं. मैं एक किसान का बेटा हूं. मैं अन्न की कीमत जानता हूं, उसी तरह मैं अपनी सफलता की कीमत भी जानता हूं, क्योंकि यह मुझे लंबी मेहनत के बाद मिली है.

पिता जी चाहते थे डॉक्टर बनूं,मगर 40 प्रतिशत से ज्यादा नंबर आए ही नहीं

मैंने कभी एक्टर बनने के बारे में नहीं सोचा था. हां, पिता जी मुझे डॉक्टर बनाना चाहते थे. मैंने कोशिश भी की, लेकिन नंबरों ने साथ नहीं दिया. चालीस से ऊपर कभी नहीं आए. फिर कॉलेज के दिनों में मैं छात्र राजनीति में सक्रिय था. एक वक्त यह भी आया जब हमने सरकार का विरोध किया और सात दिनों के लिए मुझे जेल जाना पड़ा था. वहां मैं पॉलिटिकल प्रिजनर था. दिनभर करने के लिए कुछ नहीं था तो लाइब्रेरी में जाकर खूब पढ़ता था. वहीं से मेरा हिंदी से लगाव शुरू हुआ था. उस जेल यात्रा के बाद मेरा जुड़ाव रंगमंच से हो गया और फिर थिएटर ने मुझे मुम्बई की राह दिखा दी.कह सकता हूं कि मेरे फिल्मी करियर में 7 दिन की जेल का भी योगदान है.

'करगिल गर्ल' के दौरान जाह्नवी कपूर से ही बहुत कुछ सीखने को मिला

फिल्म 'करगिल गर्ल' में मैंने जाह्वनी के पिता का किरदार निभाया है. यह किरदार मेरे अब तक के सारे किरदारों से बिल्कुल अलग है. मुझे लगता है कि जब उनकी बेटी बड़ी होकर उनसे किसी काम के लिए मदद मांगेंगी तो वह बिल्कुल ऐसे ही पिता बनना चाहेंगे, जैसे कि वह इस फिल्म में बने हैं. जहां तक सवाल जाह्वनी का है तो वह कमाल की एक्ट्रेस हैं. वह बहुत मेहनती और अपने काम को लेकर सीरियस रहती हैं. फिल्म के दौरान मैंने तो कई बातें उनसे सीखी हैं. कुल मिलाकर बहुत अच्छा अनुभव रहा ‘कारगिल गर्ल’ का.