(जयंत रॉय चौधरी)

कोलकाता, 28 अप्रैल (भाषा) पश्चिम बंगाल के चुनावी समर के आखिरी दौर में पहुंचने के बीच कोलकाता के कुछ सीमित इलाकों में रहने वाले चीनी मूल के भारतीय नागरिक राजनीतिक गतिविधियों से कुछ खास नहीं जुड़े हैं। हालांकि वे भी दूसरे लोगों की तरह अपने बेहतर भविष्य की उम्मीद लगाए बैठे हैं।

शहर का तिरेटा बाजार देश का सबसे पुराना ‘चाइना टाउन’ है और यहां सुबह के समय इन दिनों चीनी मूल के कई लोग नाश्ते में भारतीय और चीनी पकवानों का लुत्फ उठाते नजर आ जाएंगे। इस वर्ग के लोगों की जीविका भी कोरोना संकट से प्रभावित हैं।

कोलकाता में बुर्राबाजार से बेलघाटा तथा तांगरा से न्यू टाउन इलाके के बीच बसे चीन मूल के भारतीय नागरिकों की संख्या मुश्किल से 2000 होगी, लेकिन विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार इनको लुभाने की कोशिश कर रहे हैं क्योंकि इस क्षेत्र में बेहद नजदीकी मुकाबला माना जा रहा है।

जूते बनाने के कारोबार से जुड़े 84 वर्षीय डेविड चेन का कहना है, ‘‘हम आमतौर पर गैर राजनीतिक समुदाय हैं, लेकिन खबरों पर नजर बनाए रखते हैं। लोग उसी को वोट करेंगे जिसे उचित मानेंगे।’’

चूंग ये थोंग गिरजाघर के निकट शाम के समय चीनी मूल के कई भारतीय नागरिक एकत्र होंते हैं और उनकी चर्चा का मुख्य केंद्रबिंदु इन दिनों राजनीति ही बना हुआ है।

भारत और चीन के बीच 1962 में हुए युद्ध से पहले कोलकाता में 60,000 से अधिक चीनी मूल के लोग रहते थे। इस युद्ध के बाद शहर में दो सदी से रह रहे चीनी मूल के लोगों को ‘राष्ट्र विरोधी’ कहा जाने लगा। धीरे-धीरे वो यहां से चले गए और उनकी संख्या घटती गई।

रिकॉर्ड के मुताबिक, कोलकाता में 1778 में चीन से सबसे पहले यांग ताई चो ऊर्फ तोंग एच्यू पहुंचे थे और उन्होंने गन्ने की खेती और एक कारखाना आरंभ किया। यह कारखाना अब नहीं है, लेकिन अब भी उनके नाम से एक इलाके को एचीपुर के नाम से जाना जाता है।

इलाके में चटनी का कारोबार कर रहे 61 वर्षीय डोमिनिक ली ने कहा, ‘‘चीनी मूल के ज्यादातर लोग खाने के कारोबार से जुड़े़ हैं । चीन मूल के परिवारों द्वारा चलाए जाने रेस्तरां अब भी बहुत लोकप्रिय हैं।’’

कारोबारी डेविड चेन कहते हैं, ‘‘जो भी सत्ता में आए उसे अच्छा नेतृत्व प्रदान करना चाहिए। यह एक महान शहर है। अगर यहां ज्यादा अवसर पैदा होंगे तो यहां से प्रतिभाएं पलायन नहीं करेंगी और दूसरे लोग भी आएंगे।’’