केंद्र ने 31 जुलाई को नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की घोषणा की, जिसके जरिए शिक्षा और कौशल के साथ पाठ्यक्रम को इतना लचीला बनाया गया है, जिससे बच्चे पूर्ण रूप से लाभ उठा सकें. बेशक, बदलते ग्लोबल स्टैंडर्ड के हिसाब से भारत के एजुकेशन सिस्टम में बदलाव करना भी बहुत जरूरी था. वैसे तो बहुत से शिक्षाविदों ने नई शिक्षा नीति को लेकर तारीफ की है, लेकिन अभी भी कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब जानना जरूरी है. IIT दिल्ली के निदेशक और कार्यवाहक अध्यक्ष प्रोफेसर वी रामगोपाल राव ने इस पर Opoyi के सवालों का विस्तार से जवाब दिया.

आपको क्या लगता है कि तीन लैंग्वेज फॉर्मुला इंग्लिश मीडियम स्कूलों को प्रभावित करेगा?

नई शिक्षा नीति में किसी विशेष भाषा को लेकर निर्देश लागू नहीं किया गया है. शिक्षा नीति कहती है कि स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप में मातृ भाषा का इस्तेमाल कर सकते हैं. भारत में अधिकांश परिवार घर पर अंग्रेजी बोलते हैं. हमारे समाज में हम दो चीजों को मिक्स कर रहे हैं- वो है अंग्रेजी सीखना और अंग्रेजी में शिक्षा देना. यहां बात इसके जरिए बच्चों को घर में बोली जाने वाली भाषा सिखाना है. इससे बच्चों का ज्ञान ही बढ़ेगा. यह बात रिसर्च में साबित हो चुकी है कि जिस भाषा में आप रोज बोलते हैं, अगर उसमें कुछ सीखते हैं तो सभी चीजें आसानी से समझ में आ जाती है. यह अंग्रेजी मीडियम स्कूलों को प्रभावित करने जैसा कुछ नहीं है.

भारत विविधता का देश है और कोई भी किसी पर एक भाषा नहीं थोंप सकता. उदाहरण के लिए जैसे मैं दक्षिण भारतीय हूं और मेरी पत्नी उत्तर भारत से आती हैं. मेरे बच्चे अंग्रेजी बोलते हैं. इस तरह के केस बहुत से परिवारों में हैं.

नई शिक्षा नीति से उच्च शिक्षा में बदलाव की बात हो रही है. क्या इसे समझा सकते हैं?

नई शिक्षा नीति ग्रॉस एनरोलमेंट को 25 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत करने की बात करती है. जिसका मतलब साफ है कि हमें देशभर में अधिक बुनियादी ढांचे और अधिक संस्थानों की जरूरत है. आईआईटी की ही बात करें तो यहां छात्र कैंपस में ही रहते हैं. अगर इसे डबल करना है तो हमें और कैंपसों की जरूरत पड़ेगी. हमें शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता किए बिना बड़े पैमाने पर काम करने की जरूरत है. नई नीति कैसे फायदेमंद है, तभी पता चलेगा जब यह असरदार तरीके से लागू की जाएगी.

हमारे देश में उच्च शिक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती है, इसका कई क्षेत्रों में बंटा होना. हर सेक्टर के लिए आपके पास अलग कॉलेज और नियामक संस्थाएं हैं. नई शिक्षा नीति के जरिए कई विषयों में शिक्षा प्राप्त की जा सकती है, जिसका मतलब है कि आईआईटी का एक छात्र अब मेडिकल से संबंधित विषयों पर भी पढ़ाई कर सकता है. यह दृष्टिकोण छात्रों को अपने ज्ञान को बढ़ाने में मदद करेगा.

उदाहरण के लिए अस्पतालों में आपको आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के लिए एक इंजीनियर की जरूरत होती है, इसलिए इंजीनियरिंग कॉलेज में मेडिसिन से जुड़े कोर्स शुरू करने में मदद मिलेगी. इससे हेल्थ सेक्टर को बहुत फायदा होगा.

इसके लिए सारा फंड कहां से आएगा?

हमें एक ऐसे फाइनेंशियल सिस्टम पर काम करने की आवश्यकता है, जो छात्रों पर बोझ न डाले. हमें आत्मनिर्भर होने की भी जरूरत है, हमें धन के लिए हमेशा सरकार की ओर नहीं देखना चाहिए. यह नया फाइनेंशियल मॉडल समय की मांग है. सरकार ने एक समिति का गठन किया है, जिसका मैं भी हिस्सा रहा कि कैसे उच्च शिक्षा के लिए अधिक फंड लाया जा सके.

एक तरह से स्टार्टअप में निवेश इस उम्मीद से किया जा सकता है कि वह मिलियन डॉलर की कंपनी बन जाए. यदि कोई संस्थान 5% इक्विटी रखता है और स्टार्ट अप एक यूनिकॉर्न कंपनी बन जाता है. ये रिटर्न कुछ वर्षों के लिए संस्था को फंड दे सकता है. हमें विकसित होने और ऐसे विकल्पों की तलाश करने की आवश्यकता है, जो अधिक नवीन और आत्मनिर्भर हों.

उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई मॉडल का भी उदाहरण दिया, जहां छात्र मामूली शुल्क का भुगतान करते हैं और काम शुरू करने के बाद एक निश्चित राशि का भुगतान करते हैं. ये छात्र अपने माता-पिता के पैसों का उपयोग किए बिना ही उच्च शिक्षा हासिल करने में मदद करेगा. इससे सरकार का बोझ भी कम होगा.

नई शिक्षा नीति मौजूदा से कैसे अलग होगी, इस पर थोड़ी जानकारी दें?

न्यू एजुकेशन पॉलिसी एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया का पक्षधर है. IIT पहले से ही इस प्रणाली का पालन कर रहे हैं. इसके पीछे आइडिया ये है कि छात्रों के कौशल और ज्ञान टेस्ट सही रूप में लिया जाए. सही मायने में लगातार चलने वाले परीक्षण ही आपकी बुद्धिमता की सही जांच कर सकते हैं. पहले एक परीक्षा आयोजित करना और फिर इस एक सेमेस्टर को पास करने के मापदंड पर ही छात्रों का चुनाव हो जाता था. इस संभावना पर ध्यान नहीं दिया गया कि किसी दिन ये भी हो सकता है कि कोई छात्र अच्छा प्रदर्शन न कर पाए.नई शिक्षा नीति एक ही परीक्षा को को कई बार आयोजित करने के बारे में है. इससे छात्रों को बेहतर करने का मौका मिलेगा. राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी को स्थापित करने से छात्रों को ज्यादा नंबर लाने के बजाय सीखने में अधिक मदद मिलेगी.