मध्यप्रदेश के इतिहास में कोरोना संक्रमण के बीच निर्मित असाधारण हालात में असाधारण तरीके से 18 विधायकों का एकमुश्त समर्थन वापस लेकर कांग्रेस सरकार को गिराकर भाजपा की सरकार बनाने के बाद अब 28 विधानसभा सीटों पर पहली बार 3 नवंबर को शिवराज, सिंधिया और कमलनाथ का राजनितिक भविष्य तय होगा. वहीं उपचुनाव में इस बार परिणाम भी असाधारण और आश्चर्यजनक ही होंगे.

आपको बता दें कि इसी मध्यप्रदेश में 52 साल पहले 1967 में कांग्रेस सरकार को जिस महिला नेत्री राजमाता विजयाराये सिंधिया ने बगावत कर उखाड़ फेंका था,और 36 विधायक तोडक़र संविद सरकार बना डाली थी. इसी तरह सिंधिया राजघराने के महाराजा ने भी 23 मार्च 2020 को 18 विधायक तोडक़र भाजपा की सरकार बनवा दी. तब राजमाता सिंधिया द्वारकाप्रसाद मिश्र द्वारा अपमानित किये जाने से आहत थीं तो वहीं अब महाराज कमल नाथ से आहत होकर बगावत पर उतरे थे . तब दलबदल कानून न होने से उप चुनाव नहीं हुए और सरकार 19 माह बाद गिर गई थी. लेकिन अब कानून होने से तमाम विधायक अयोग्य हुए तो उप चुनाव हो रहे हैं. बहरहाल. ये उप चुनाव केवल राजनीतिक नहीं रह गये हैं. इसके परिणाम "महाराज" "कमलनाथ","शिवराज",कांग्रेस और भाजपा के लिये समान रूप से निजी प्रतिष्ठा, अस्तित्व और राजनीतिक भविष्य की इबारत लिखने वाले होंगे. आज हालात ये हैं कि कोई निश्चिंत नहीं है, भरोसेमंद नहीं है. जीत की सब बात कर रहे हैं तो हार के आसन्न खतरे से कंपकंपी छूट रही है.

मुद्दों की भरमार वाले दौर में निजी खुन्न्स का जो नाच मचा है, उसने सारी मान्यतायें छिन्न-भिन्न कर दीं. इन चुनावों की सर्वाधिक अहमियत ज्योतिरादित्य के लिये है तो शिवराज,कमलनाथ,कांग्रेस और भाजपा की दिशा-दशा भी इससे तय होना है, यही कारण हैं की आज सभी पूरजोर कोशिशें विजय पाने की कर रहे हैं.

सिंधिया के लिये अहमियत इसलिये है क्योंकि कांग्रेस ने मार्च से एक सूत्री कार्यक्रम चला रखा है, " सिंधिया गद्दार है" बिके हुए हैं. जनता कांग्रेस को जिताये, यह मुद्दा नहीं है, विश्वासघातियों को सबक सिखाये, यह जरूरी है. उन पर आरोप के बहाने अतीत को भी उघाड़ा जा रहा है. देर तक खामोशी ओढ़े रहे महाराज ने भी पलटवार प्रारंभ किये . महाराज की मुश्किलें केवल इतनी नहीं है कि कांग्रेसी उन्हें कोस रहे हैं, काले झंडे दिखा रहे हैं, महाराज कहते जिनके गले नहीं सूखते थे, वे औकात तय कर रहे हैं. उनकी दोहरी दुविधा यह भी है कि भाजपाई कार्यकर्ता उन्हें पचा नहीं पा रहा है. उनके अपने गढ़ ग्वालियर-चंबल में तो कांग्रेसियों के साथ-साथ भाजपाई भी सिंधिया के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं. भाजपा के प्रचार अभियान,साहित्य में सिंधिया की अनदेखी, रैलियों में अपेक्षाकृत कम भीड़, स्टार प्रचारकों की सूची में दसवां क्रम ऐसे मुद्दे हैं जो सिंधिया को व्यथित किये हुए हैं.

प्रारंभिक अनुमान बताते हैं कि ग्वालियर-मुरैना जिला की सात सीटों में से सिंधिया समर्थक याने भाजपा की एकाध सीट आ जाये तो बड़ी बात है. इसी तरह से सिंधिया समर्थक 18 प्रत्याशियों में से 8-10 प्रत्याशी ही जीत के करीब बताये जा रहे हैं. इसमें बाद में कांग्रेस से भाजपा में आये 6 विधायक उनके समर्थक हैं भी नहीं .

सिंधिया की मुश्किलें इसलिये भी ज्यादा हैं कि जहां से उनके समर्थकों को टिकट दिया गया है, वहां 2018 के चुनाव में उनसे पराजित भाजपा प्रत्याशी और उन इलाकों के पुराने भाजपा कार्यकर्ता रस्मी तौर पर भले ही मैदान में नजर आ जायें, दिल से वे साथ नहीं हैं. उनकी दिली इच्छा तो यह है कि सिंधिया समर्थक हार जायें, ताकि भाजपाइयों के भविष्य का रास्ता बंद न हो. याने जिस तरह से 2018 के चुनाव में भाजपा को कुछ सीटें भाजपाइयों ने हरवाई थीं, वह इतिहास इस बार भी दोहराया जा सकता है. ऐसा होना खतरनाक साबित होगा.

इसका यह मतलब भी नहीं है कि भाजपा की सरकार जा रही है या बहुमत रखने लायक सीटें नहीं जीत पा रहे हैं. चूंकि भाजपा को नाममात्र की सीटें ही चाहिये, जिसका संकट नजर नहीं आता, जब तक कि आसमानी-सुल्तानी न हो. यूं तो भाजपा सरकार महज 10 सीटें जीतकर भी मजबूती ले लेगी, लेकिन तब कांग्रेस भी शेर हो जायेगी, वह खतरा सामने है. राजनीतिक विश्लेषक, मैदानी पत्रकार, प्रदेश का शीर्ष नेतृत्व और राजनीतिक परिदृश्य पर नजर रखकर निरपेक्ष आकलन करने वाले और सट्टा बाजार के जादूगर 18 भाजपा, 8 कांग्रेस और 2 सीटों की अस्थिरता बताते रहे हैं,जो अब 15 भाजपा पर आ गये हैं. मुरैना की एक सीट बसपा के खाते में जाना भी बताया जा रहा है.

इन चुनाव के परिणामों से कमलनाथ का भविष्य भी तय होगा. वे नेता प्रतिपक्ष तो बने रहेंगे, लेकिन कांग्रेस में उनके वजन का फैसला इससे जरूर होगा. जिस तरह से प्रचार अभियान सिंधिया -कमलनाथ के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है याने व्यक्तिगत हो गया है, वह दोनों के राजनीतिक भविष्य के लिये ठीक नहीं होगा. शिवराज की आगामी राजनीति का दारोमदार भी इन्हीं परिणामों पर टिका है. यूं वे नुकसान में नहीं रहेंगे, क्योंकि वे कोई कसर नहीं छोड़ रहे. आखिर उन्हें भी केंद्र में अपना भविष्य तलाशना है. बावजूद इसके वे सिंधिया समर्थक सीटों के भाजपाइयों पर दबाव-प्रभाव नहीं डाल पा रहे हैं. शिवराज जानते हैं कि मप्र में यह उनका आखिरी चुनाव है. खैर.

10 नवंबर में ज्यादा देर नहीं है. इससे पहले 3 नवंबर का मतदान प्रतिशत आधी तस्वीर साफ कर देगा . ये चुनाव और इसके परिणाम दिलचस्प,अप्रत्याशित साबित हो सकते हैं . जो जनता सब जानती है, वह क्या बताती है और क्या करती है, यह भी साफ हो जायेगा.