चीन की अराजकता का गोरखधंधा

चीन की आर्थिक वृद्धि एक बड़ी वैश्विक भू-राजनीतिक घटना रही है. इसने भू-रणनीति के कैनवास पर लहरों -सी हलचल मचाई है. इस समय समुद्री और हिमालयी क्षेत्र दोनों में कोरोना को लेकर दबाव है. आर्थिक रूप से वैश्विक वर्चस्व हासिल करने लिए वह अपने विरोधियों को आर्थिक रूप से कमजोर करने का रास्ता खोज रहा है. नाजीवादी सोच और शी की नीतियों में कर्ज जाल की कूटनीति, उइगर मुस्लिमों के लिए छुपे हुए एकाग्रता शिविर, हांगकांग व ताइवान में असहमति इसे और मजबूत करने का काम करती हैं. हालांकि वैश्विक प्रयासों के चलते एक वैकल्पिक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का निर्माण हो रहा, जिससे चीन पर निर्भरता कम हो रही है और उसकी कमजोरियां भी सामने आ रही हैं. ड्रैगन को रोकने के लिए वैश्विक विकल्प सीमित हैं. इसके लिए उसे किसी काम में लगाकर रखना होगा या उसके साथ एक असहज शांति वाला रुख रखना ही होगा, जब तक कि वह दोबारा प्रहार नहीं करता.

द ग्रेट वाल ऑफ चाइनानॉमिक्स

पिछले 40 वर्षों में चीन दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और $ 14 ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था वाला सबसे तेज विकास का इंजन बन गया है. इसकी अर्थव्यवस्था के लचीलेपन का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तियानमेन स्क्वायर की बर्बर घटना, SARS महामारी, 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट और अब कोरोना महामारी के बीच भी वह सकारात्मक विकासदर बरकरार रखे हुए है. हालांकि महामारी के झटके ने भू-अर्थशास्त्र, भू राजनीति और वैश्विक रणनीतिक सुरक्षा कमजोरियों को उजागर जरूर किया है. चाइनानॉमिक्स के चीनी सपने का नेतृत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि वर्तमान में राजनीतिक संतुलन अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है. वैश्विक रूप से मजबूत और प्रभावी खिलाड़ी इसकी सरपट दौड़ में बाधा डालने के लिए इसकी लगाम खीचेंगे या नहीं, भले ही इसके लिए शॉर्ट टर्म आर्थिक लागत की भी आवश्यकता पड़े. विश्व के सामने चीन को आर्थिक रूप से कमजोर करने, सैन्य रूप से रोकने और राजनीतिक रूप से उलझाए रखने की चुनौती है ताकि इससे घबराए या परेशान हुए ड्रैगन को उसकी रणनीति से पीछे हटाया जा सके.

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चीन में सामाजिक व्यवस्था और आतंरिक नियंत्रण बनाए रखने लिए आर्थिक चक्र ठीक रहना जरूरी है ताकि शी जिनपिंग के नेतृत्व वाले सीसीपी की वैधता और उसके लिए स्वीकृत माहौल बना रहे सके. नागरिकों को भी ये अपने पक्ष में लगता है और इसे समृद्धि पैदा होने और गरीबी कम करने के साधन के रूप में देखा जाता है. इसके विपरीत गरीबी और बड़े पैमाने पर बेरोजगारी की गंभीर संभावनाएं नागरिकों में अशांति और सरकार का पतन कर सकती हैं. इसलिए चिनानॉमिक्स जरूरी है. CCP की शी-नोमिक्स के जरिए राजनीतिक नियंत्रण और उसकी भू राजनीतिक शक्ति को मजबूत किया जाता है. संक्षेप में यह चीन की जबरदस्त कूटनीति का भू-अर्थशास्त्र है, जो अन्य देशों के खिलाफ राजनीतिक रियायतें लेने और प्रतिशोध लेने के लिए है.

सपने बनाम दु:स्वप्न : मिथक और वास्तविकताएं

COVID-19 महामारी ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर एक अमिट छाप छोड़ी है. आईएमएफ ने जून 2020 में अपने वैश्विक विकास से जुड़े अनुमान को नकारात्मक यानी घटा हुआ बताया है. 2020 के लिए 4.9 प्रतिशत और अगले दो वर्षों में $ 12 ट्रिलियन से अधिक का अनुमानित नुकसान होगा. चीन के नेतृत्व ने क्रमिक और असमान वसूलियों से बहुत सारे देशों के डिजिटल स्पेस पर कब्जा कर लिया गया है. चीनी अर्थव्यवस्था के कई शेड हैं - कुछ अच्छे, कुछ बुरे और कुछ बदसूरत. फिर भी चाइनानॉमिक्स का असली अर्थ तीन प्रमुख मिथकों और वास्तविकताओं में छिपा हुआ है.

COVID-19: आर्थिक लचीलापन और जीडीपी

मिथक- महामारी के बाद चीन के अन्य अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सबसे तेजी से उबरने की संभावना है. पहली तिमाही की -6.8 प्रतिशत की नकारात्मक जीडीपी से दूसरी तिमाही में सकारात्मक 3.2 प्रतिशत की जीडीपी वृद्धि दर्ज की है. यह इसके लचीलेपन और आर्थिक विकास के मजबूत सिद्धांतों को दर्शाता है.

सच्चाई- तथ्य यह है कि चीनी अर्थव्यवस्था ने महामारी से पहले भी दोहरे अंकों की वृद्धि से एक अंक की वृद्धि का सामना किया. इसकी चमक एक भ्रम है. चीन द्वारा बताई गई 3.2 प्रतिशत की वृद्धि बुनियादी ढांचे और रियल स्टेट में क्रेडिट फ्यूल इंवेस्टमेंट बढ़ने पर आधारित है, जो कि बढ़ते कर्ज के बोझ को दर्शाता है.

IMF के वर्ल्ड इकोनोमिक आउटलुक जून 2020 में चीन की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर लगभग 1.0% है जो कि 1976 के बाद सबसे कम गति से विकास करने वाली दर है, जबकि राजकोषीय नीति, मौद्रिक नीति और वित्तीय उपायों के माध्यम से वसूली ने वृद्धि दर को गोता मारने से रोकने में मदद की है, हालांकि महामारी ने वर्तमान प्रणाली की संरचनात्मक, सामाजिक और समावेशी कमजोरियों को भी उजागर किया है. सरकार द्वारा बड़ी कंपनियों बनाम निजी मांग से संचालित होने वाले आत्मनिर्भर विकास उद्यमों को समर्थन की कमी के कारण उच्च और निम्न-आय श्रेणियों के बीच असमानताएं पैदा हुई हैं.

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सरकार के थिंक-टैंक चाइना सेंटर फॉर इंटरनैशनल इकोनॉमिक एक्सचेंज के एक शोधकर्ता वांग जू कहते हैं, "सरकार की नीति वायरस के प्रकोप के बाद फैलने वाले गैप को कम करने में विफल रही हैं." "यह कम-आय वाली आबादी के रूप में समग्र खपत वसूली पर एक रोक लगा रही है, जो उच्च-आय वाले लोगों की तुलना में बहुत अधिक है." इसी के चलते एक प्रभाव ये पड़ेगा कि निर्यात की वैश्विक मांग भी कमजोर होगी.

इस प्रकार महामारी के बाद चीन का आर्थिक पुनरुद्धार मौलिक और संरचनात्मक रूप से कमजोर है. इसमें व्यापक आर्थिक सुधार और मानदंडों का पुनर्मूल्यांकन कर इसे सही रूप में स्थापित नहीं किया जाएगा.

गरीबी और बेरोजगारी दर

मिथक- गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन अभियान को लेकर चीन ने एक सफल दृष्टिकोण अपनाया है.

कोविड -19 के प्रकोप से पहले चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, बेरोजगारी के आंकड़े उल्लेखनीय रूप से 5.9% पर स्थिर रहे, वहीं मार्च 2020 के लिए दिसंबर में पंजीकृत आंकड़े भी 5.2% से बहुत दूर नहीं थे. वहीं विडंबना यह है कि कोरोना काल के महीनों में, 460,000 व्यवसायों को दिवालिया घोषित कर दिया गया. इन चीनी आकंड़ों में 50 मिलियन बेरोजगार प्रवासी मजदूरों को बिना किसी हिसाब के बस यूं ही छोड़ दिया गया.

सच्चाई- वास्तविकता यह है कि चीन की बढ़ती बेरोजगारी, गरीबी और आय में असमानता के साथ-साथ बढ़ते शहरी प्रवास और भेदभाव वाली राजकोषीय नीतियों से सामाजिक स्थिरता और कम्युनिस्ट पार्टी की वैधता को खतरा है.

2019 में शहरी बेरोजगारी की दर 5.3 प्रतिशत पर स्थिर थी, जो दो साल में सबसे अधिक रही, COVID-19 महामारी के बाद स्थिति और खराब हो गई.

यह अनुमान लगाया जाता है कि चीन की वर्तमान बेरोजगारी दर 20.5% से अधिक है, क्योंकि चीन ने मार्च 2020 में लगभग 5.9% के अनुमान को छुपा दिया था, जिसके परिणामस्वरूप लगभग 70 मिलियन बेरोजगार थे.अनौपचारिक रोजगार क्षेत्रों और विशेष रूप से प्रवासी श्रमिक सबसे बुरी तरह प्रभावित हुए हैं. वैसे चीन हर साल 10 मिलियन लोगों को रोजगार देने का लक्ष्य रखता है. 2021 तक चीन ने पूर्ण गरीबी को खत्म करने और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने का लक्ष्य रखा था.

प्रीमियर ली केकियांग ने हाल ही में स्वीकार किया कि चीन में 600 मिलियन से अधिक लोगों की मासिक आय $ 140 है - जिससे चीनी शहरों में एक कमरे का किराया ही निकलता है. एक अनुमान बताता है कि COVID के चलते चीन निर्यात क्षेत्र में लगभग 18 मिलियन नौकरियां खो सकता है, जो कि उसकी इंडस्ट्री फोर्स का एक तिहाई है.

बढ़ती बेरोजगारी खपत आधारित आर्थिक विकास के लिए एक बड़ा झटका है. साथ ही एक बच्चा नीति के चलते काम करने वाली आबादी भी सिकुड़ रही है, जिससे यह और बढ़ेगी. चिंता का एक अन्य क्षेत्र कृषि भी है, जो चीन के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 7% है, इस पर उसके 40% से अधिक लोग निर्भर हैं.लॉकडाउन और ट्रांसपोर्ट पर प्रतिबंधों ने खाद्य मुद्रास्फीति को बढ़ाया और बाढ़ के चलते भोजन की कमी भी बड़ी है. इस प्रकार एक समृद्ध समाज का सपना दुःस्वप्न में बदल रहा है.

कर्ज फंडिंग की फायरबॉल

मिथक- उचित भंडार के साथ राजकोषीय ताकत राष्ट्र और इसके लोगों दोनों के लिए महामारी जैसे संकट में कर्ज नीति को एक फायदे का सौदा दिखाती है. वह कमजोर अर्थव्यवस्थाओं के लिए सबसे बड़ा कर्जदाता भी है और इस प्रकार दुनिया के बुनियादी ढांचे के विकास और कनेक्टिविटी में OBOR जैसी पहलों में वह एक बड़े प्लेयर की भूमिका में है. चीन का बढ़ता कर्ज भी महामारी के खतरे से पैदा होने आर्थिक पतन को रोकने के लिए सोची-समझी रणनीति का परिणाम है. चीन की राजकोषीय नीतियां प्रचुर मात्रा में तरलता सुनिश्चित करने और बाजार दर और बांड कम रखने के लिए लचीली बनी हुई हैं, जो आंतरिक और बाह्य दोनों तरह से ऋण के बोझ को कम करती हैं.

सच्चाई : ये मिथक अस्पष्टता और अपारदर्शिता से भरा है. चीन बढ़ते कर्ज और इसकी वजह से जीडीपी अनुपात के संकट से जूझ रहा है. 2020 में चीन का कुल कर्ज 14 प्रतिशत बढ़ने की संभावना है, क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करने के लिए वह ऋण का ही उपयोग करता है. चीन का ऋण जीडीपी अनुपात में वृद्धि करेगा, जो 2020 में 273% तक बढ़ने का अनुमान है.

विडंबना यह है कि अर्थव्यवस्था जिस देश में ढलान पर जा रही है, उद्योग घट रहे हैं, छंटनी की रफ्तार बढ़ रही है और गरीबी की मार है तो चीन खासतौर पर अफ्रीका और एशिया के छोटे कमजोर देशों के लिए कर्ज का जाल बिछा रहा है. चीन द्वारा दुनियाभर के 150 से अधिक देशों को प्रत्यक्ष ऋण और व्यापार में $ 1.5 ट्रिलियन क्रेडिट का अनुमान लगाया गया है. चीन दुनिया का सबसे बड़ा आधिकारिक लेनदार है.फिर भी इसके अधिकांश आंकड़े स्वस्थ अवस्था में नहीं हैं या छिपे हुए कर्ज के साथ भरे हैं.

यह अनिवार्य रूप से इसकी टूटी हुई राजकोषीय प्रणाली के कारण है, जिसमें कर्ज को लेकर नीतिगत अस्पष्टता है. और कर्ज पॉलिसी में वसूली को लेकर भी वह मौन रहता है, जिससे व्यक्तिगत आयकर बढ़ाने, एक नई संपत्ति कर व्यवस्था स्थापित करने और केंद्रीय और स्थानीय सरकारों के बीच राजस्व के बंटवारे को लेकर एक अधिक न्यायसंगत प्रणाली विकसित करने की आवश्यकता महसूस हो रही है.

चिंता चीन के छिपे हुए एजेंडे की है और इसका रणनीतिक लाभ आर्थिक संकट का सामना कर रहे देनदार देशों के खिलाफ है. चीन के 'वन बेल्ट, वन रोड' ऋण-जाल ने विशेष रूप से दक्षिण एशिया, अफ्रीका और आर्थिक रूप से वंचित राष्ट्रों की स्वतंत्रता को कम कर दिया है.

हालांकि फेस वैल्यू में चीन की उदारता प्रदर्शित कराई जाती है कि बुरे ऋणों में वह आसानी से दोबारा तोलमोल कर लेता है, पुनर्गठित और लचीला रुख अपनाता है. सच्चाई ये है कि इसमें अपनी ऋण कूटनीति के हिस्से के रूप में रणनीतिक निर्भरताएं पैदा की हैं. वह इसका इस्तेमाल वैश्विक पावरप्ले और सैन्य सुविधाओं के लिए करता है. श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह को भी चीन ने ऋण जाल मामले में फंसाया. 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर ऋण के भुगतान संकट के बढ़ने के बाद कर्ज चुकाने के लिए इस बंदरगाह को एक चीनी फर्म को 99 साल के पट्टे पर दे दिया.

श्रीलंका सरकार की चीन समर्थक सोच का नतीजा ही है कि वह चीनी कर्ज की दूसरी किश्त की उम्मीद में है, क्योंकि इसकी पर्यटन पर निर्भर अर्थव्यवस्था अभी संकट में है. इस प्रकार प्रमुख मुद्दा यह है कि 2021 में चीन का विकास इससे तय होगा कि सरकार की क्रेडिट नीति और ऋण जाल पर वह दबाव डालेगी या नहीं.