केरल के तिरुवनंतपुरम से कांग्रेस के सांसद शशि थरूर राजनयिक, राजनेता, लेखक सहित कई तरह की भूमिकाएं निभाते हैं. Opoyi के साथ बातचीत में लोकसभा सांसद शशि थरूर ने पूरी दुनिया को घुटने के बल खड़ा करने वाली महामारी कोविड-19 से जुड़े सरकार के फैसलों और समस्याओं पर अपनी राय रखी. साथ ही लद्दाख में भारत और चीन गतिरोध पर पूर्व राजनयिक ने बीजिंग की 'बढ़ती क्रूरता' के खिलाफ चेतावनी भी दी. पढ़ें Opoyi के साथ शशि थरूर की खास बातचीत.

Opoyi: बहुत से विशेषज्ञों का कहना है कि मार्च में लगा लॉकडाउन और जल्दी अनलॉक एक अपरिपक्व निर्णय था. आपकी इस पर क्या राय है?

शशि थरूर : मुझे लगता है कि सरकार की प्रवासी श्रमिकों के प्रति अदूरदर्शिता की कमी के चलते लॉकडाउन में इस तरह का अराजक और परेशान करने वाला संकट पैदा हुआ. वैसे, शुरुआती स्तर पर ही लॉकडाउन की घोषणा के फैसले से ज्यादातर लोग सहमत दिखे, लेकिन लॉकडाउन से पैदा होने वाले संकट को सरकार कम आंक कर चल रही थी. ये पूरी तरह से प्लानिंग की कमी के कारण हुआ. प्रवासी श्रमिकों को लेकर सरकारी कुप्रबंधन का नतीजा ही था कि घबराहट, अराजकता और त्रासदी के बीच वे अपने घरों को लौटने के मजबूर हुए. करीब 200 प्रवासी मजदूरों की घर पहुंचने के रास्ते में ही मौत हो गई.

इसे रोकने के लिए सरकार लॉकडाउन और ट्रेनों-राजमार्गों को बंद करने से पहले और अधिक नोटिस दे सकती थी. इसके साथ ही इन मजदूरों को अपने गृहराज्य लौटने की अनुमति दे सकते थे या उन क्षेत्रों में आवश्यक व्यवस्था कर सकते थे, जिनमें ये रह रहे थे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

केंद्र राज्यों के साथ मिलकर काम कर सकता था ताकि प्रवासियों के लिए अंतर जिला और अंतर राज्य परिवहन व्यवस्था के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी हो सकें. जो लौटना चाहते थे उन्हें वापस लाने के लिए स्पेशल ट्रांसपोर्ट कोरिडोर की व्यवस्था कर सकते थे. भ्रमित करने वाली सूचनाओं और ड्रामा जो उस समय क्रिएट हुआ वह भी सब जानते है. जब विशेष ट्रेनों का परिचालन किया गया, तब भी इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं थी कि टिकटों का भुगतान कौन करेगा? अगर सरकार ने प्रवासियों की मदद के लिए कुछ नियम और उपाय पहले ही लागू कर दिए होते तो वह संकट टाला जा सकता था. लोगों को यातना से भरा कष्ट नहीं सहना पड़ता.

जिस तरह से 'अनलॉक' किया उस पर कई सवाल हैं. सरकार की अयोग्ता के परिणामस्वरूप ही अर्थव्यवस्था सुस्त रही और इसी ने सरकार को लॉकडाउन खत्म करने के लिए मजबूर किया. इसी का नतीजा हुआ कि हर दिन 15 हजार से अधिक नए मामले सामने आ रहे हैं. अब हम एक अस्थिर अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य संकट की दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं.

Opoyi: भारत की स्थिर अर्थव्यवस्था और जीडीपी को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे?

शशि थरूर : महामारी के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया अत्यधिक निराशाजनक रही, जो किसी भी प्रकार की पारदर्शिता से भी परे थी. सरकार अपने सबसे कमजोर तबके के लोगों की रक्षा करने में विफल रही. यह सिर्फ महामारी की वजह से नहीं है, जिसके कारण हम वर्तमान में इस संकट में फंसे हुए हैं. सरकार इस मामले में गलती पर गलती करती रही. MSME सेक्टर में नोटबंदी से विनाश हुआ, इसके बाद जीएसटी और आर्थिक वास्तविकताओं का सामना करने की अनिच्छा का नतीजा ये हुआ कि अर्थव्यवस्था नाटकीय रूप से धीमी हो गई है. 

दुनियाभर की सरकारों में हमने देखा कि आम रणनीतियों के माध्यम अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए कदम उठाए गए. इसमें छोटे और मध्यम व्यवसायों के लिए प्रोत्साहन, कर में कटौती, प्रोत्साहन पैकेज और इसके साथ ही कुछ मामलों में सरकार ने श्रमिकों का वेतन देने की पेशकश भी की ताकि उन्हें निकाला ना जाए. दुनिया में भारत की एकमात्र ऐसा देश प्रतीत हो रहा है जिसकी आपदा में प्रतिक्रिया किसी भी प्रकार की तैयारियों और दूरदर्शिता से परे दिख रही है. सरकार को लॉकडाउन के बाद हमारे किसानों और प्रवासी कामगारों की तुरंत की जरूरतों पर वादे और पैकेज की घोषणा में 50 दिन लग गए.

अब पेट्रोल की कीमतों को ही लें. कच्चे तेल की कीमतों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमी आई हुई है. जब सरकार को पता है कि भारतीय लोग किस तरह की मुसीबतों का सामना कर रहे हैं तो उन्होंने पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोत्तरी के विकल्प को चुना. यह किसी भी लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकार के लिए गलत है, जो जनता के खर्च पर अपना खजाना भरना चाहती है.

Opoyi: कोविड -19 ने हमारी स्वास्थ्य प्रणाली को चुनौती दी है. क्या आपको लगता है कि हम इस मामले में चूक गए?

शशि थरूर : कई मायनों में वर्तमान संकट ने हमारे मौजूदा स्वास्थ्य सेवा ढांचे के दोषों को उजागर कर दिया है. इसमें सबसे प्रमुख बात ये है कि हमारे देश में स्वास्थ्य सेवा पर कम खर्च होता है. यह निश्चित रूप से फैक्ट है कि इस मुद्दे पर किसी भी राजनीतिक दल ने पर्याप्त जोर नहीं दिया (हालांकि इस महामारी के बाद परिवर्तन की संभावना है). अभी चिंता इस बात की है सरकार ने हमेशा की तरह इस संकट के दौरान भी पारदर्शिता और विश्वास की कमी बनाए रखी. लॉकडाउन और अनलॉक को अक्षम तरीके से लागू करने के कारण कोरोना के मामले दिन पर दिन बढ़ रहे हैं. केरल में संक्रमण की दर कम है, क्योंकि सत्तासीन सरकार ने जल्द और प्रभावशाली कदम उठाए. व्यापक टेस्टिंग और कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग के साथ बाहर से आने वालों की कड़ी स्क्रीनिंग और बड़े समारोह पर प्रतिबंध से केरल इस महामारी पर काबू रखने में केंद्रीय सरकार से काफी आगे है.

Opoyi: लद्दाख में भारत-चीन के गतिरोध को लेकर आप क्या सोचते हैं?

शशि थरूर: इस मामले में चीनी सैनिकों की क्रूर हिंसा और हमारी सरकार की आतार्किक प्रतिक्रिया को लेकर मैं काफी चिंतित हूं. 20 जवान अपनी ड्यूटी करते हुए शहीद हो गए. प्रधानमंत्री का खुद का बयान विरोधाभासी रहा. उससे किसी का भरोसा नहीं जगा. यदि चीनी सैनिकों ने भारतीय क्षेत्र में घुसपैठ नहीं की तो हमारे जवानों को कहां और क्यों मारा गया? तथ्यों से पता चलता है कि यह कार्रवाई पूर्व निर्धारित और प्लान करके की गई थी. यदि हम अपनी सरहदों की रक्षा करना चाहते हैं तो चीन की बढ़ती दमनकारी और क्रूर नीतियों के खिलाफ हमें जागना होगा. मैंने इस मुद्दे पर 2017 में विदेश मामलों की स्थायी समिति के सामने भी चिंता व्यक्त की थी और इस मामले में कुछ सिफारिशें भी की थीं. उसके बाद से मेरी चिंता केवल बढ़ी ही है. भारत को यथास्थिति (यानी अप्रैल के अनुसार) की बहाली पर जोर देना चाहिए.

Opoyi: नेपाल से मानचित्र विवाद के बाद आपको लगता है कि भारत इस क्षेत्र में भी अपना प्रभाव खो रहा है? 

शशि थरूर: मैं नेपाल के क्षेत्रीय मानचित्रों में एकतरफा संशोधन से गंभीर रूप से चिंतित हूं. समस्या की जड़ें बेशक नेपाल की घरेलू राजनीति में हैं. खासकर सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर तनाव है. इसके अलावा वर्तमान सरकार के शासनकाल के दौरान अधिक मुखर रवैये के कारण अलगाव और आक्रोश पैदा हुआ. मैं सरकार से इस मुद्दे पर तेजी से समाधान के लिए आग्रह करूंगा ताकि भारतीय संप्रुभता पर सवाल न उठे. साथ ही सरकार को अपनी विदेशनीति के दृष्टिकोण पर पुनर्विचार करना चाहिए.

Opoyi : आपने अक्सर फेक न्यूज के खिलाफ दृढ़ता से बात रखी है. आपके अनुसार इससे बचने का क्या उपाय है?

शशि थरूर : पूरी दुनिया में फेक न्यूज का संकट है. मुझे यह कहते हुए खेद महसूस हो रहा है कि निश्चित रूप से ये भारत में भी है. सोशल मीडिया फर्म जिन पर ये खबरें साझा की जाती हैं, निश्चित रूप उनके प्लेटफॉर्म पर निगरानी रखकर बड़ा रोल निभा सकते हैं, ताकि इस तरह के नकली और भ्रामक समाचार हट सकें.