निकोलस स्कॉट, सिडनी विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान में पोस्टडॉक्टरल रिसर्च फैलो और जेसी वान डी सैंडे, सिडनी विश्वविद्यालय में खगोल विज्ञान में एआरसी डीईसीआरए फैलो

कैनबरा, 26 मई :द कन्वरसेशन: यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि हमारी आकाशगंगा ब्रह्मांड में सबसे अधिक अध्ययन की जाने वाली आकाश गंगा है क्योंकि हम यहां रहते हैं, लेकिन केवल एक आकाशगंगा के अध्ययन से सिर्फ उन जटिल प्रक्रियाओं के बारे में ही पता चल सकता है, जिनके द्वारा आकाशगंगाएं बनती है या विकसित होती हैं। दूर की अन्य आकाशगंगाओं के अध्ययन के बिना यह जिज्ञासा शांत नहीं हो सकती कि हमारी आकाशगंगा एक सामान्य आकाशगंगा है या यह असामान्य और अद्वितीय है।

एस्ट्रोफिजिकल जर्नल लैटर्स में प्रकाशित हमारे शोध के अनुसार हमारी आकाशगंगा के बारे में पहला अनुमान सही है। हमारी आकाशगंगा के स्वरूप के महत्वपूर्ण विवरण का मिलान अगर आसपास की आकाशगंगाओं के साथ किया जाए तो पता चलता है कि हमारा घर कुछ इतना भी खास नहीं है। पहली नजर में इस बात पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है कि ब्रह्मांड के अध्ययन योग्य भाग में जो अरबों आकाशगंगाएं हैं, उनमें हमारी आकाशगंगा न तो सबसे बड़ी है, न सबसे पुरानी और न ही सबसे विशाल। यह भी ब्रह्मांड की उन अन्य लहरदार आकाशगंगाओं जैसी दिखाई देती है, जो आकाशगंगाओं का सबसे सामान्य प्रकार है।

लेकिन जब हम आकाशगंगा की संरचना और इसके रासायनिक स्वरूप की बात करते हैं तो यह अलग दिखने लगती है। जब हम इन सर्पीली आकाशगंगाओं के सिरे :जहां सर्पिल भुजाएं बनना संभव नहीं है: से देखते हैं तो यह हमें एक उभरी हुई गोल आकृति जैसी दिखती हैं, जिनके बीच में आड़ू जैसी आकृति बनती है। खगोलविदों ने इसे कम से कम एक सदी से जाना है। हालाँकि, वह साधारण तस्वीर 1983 में बदल गई, जब ऑस्ट्रेलियाई दूरबीनों का उपयोग करने वाले शोधकर्ताओं ने आकाशगंगा में एक प्राचीन 'मोटी डिस्क' जैसे घटक की खोज की। पहले के अध्ययन में खोजी गई गोल आकृति जिसे पतली डिस्क कह सकते हैं, के मुकाबले यह संरचना धुंधली है और इस मोटी डिस्क को नग्न आंखों से देख पाना संभव नहीं है, जबकि पहले खोजी गई आकृति एक साफ रात में आकाश में सितारों की एक लकीर के रूप में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है

पतली डिस्क, जहाँ हमारा सूर्य रहता है, लगभग एक हजार प्रकाश-वर्ष मोटी और लगभग एक लाख प्रकाश-वर्ष व्यास की है, और उसी तल में, मोटी डिस्क के बीच से होकर गुजरती है। मोटी डिस्क कुछ हज़ार प्रकाश-वर्ष मोटी तो है, लेकिन सितारों की संख्या के हिसाब से कम घनी है। हाल ही की एक दिलचस्प खोज से पता चलता है कि मोटी और पतली डिस्क में बहुत अलग प्रकार के तारे होते हैं। पतली डिस्क में जो सितारे हैं उनमें भारी तत्वों जैसे लोहा ('धातु', खगोल विज्ञान की भाषा में) और अपेक्षाकृत कम मात्रा में 'अल्फा तत्व' (कार्बन, ऑक्सीजन, मैग्नीशियम, सिलिकॉन और कुछ अन्य) का उच्च अनुपात होता है। जबकि मोटी डिस्क में मौजूद सितारों में लगभग 100 गुना कम धातु होती है, लेकिन अल्फा तत्वों की अधिकता होती है।

इस डबल-डिस्क संरचना को इसके सितारों की विशिष्ट आबादी के साथ, कंप्यूटर विश्लेषण में दोहराना बहुत मुश्किल है क्योंकि लंबे समय तक, समान संरचना वाले कंप्यूटर मॉडल केवल एक विशिष्ट परिदृश्य में ही बनाए जा सकते थे। ऐसे में हमने चिली में यूरोपियन सदर्न आब्जर्वेटरी में बहुत बड़े टेलीस्कोप के जरिए हमारी आकाशगंगा जैसी दिखने वाली कुछ आकाशगंगाओं का अध्ययन किया।

इस दौरान एक खास आकाशगंगा यूजीसी 10738, जो लगभग 32 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर है, के अध्ययन से पतली और मोटी परतों को अलग करने और उनमें तुलना करने के बाद हमें पता चला कि यूजीसी 10738 के सितारों की रासायनिक संरचना हमारी आकाशगंगा के सितारों की रासायनिक संरचना जैसी ही है। मोटी और पतली परत में मिलने वाले सितारों में धातु-समृद्ध और मैग्नीशियम की कमी वाले सितारों को आकाशगंगा के केंद्र के साथ एक पतली डिस्क में केंद्रित पाया, जबकि इसके ऊपर और नीचे कम धातु और मैग्नीशियम से भरे सितारों का एक अलग समूह मोटी डिस्क क्षेत्र में पाया। इसका सीधा अर्थ है कि वह दूर की आकाशगंगा उल्लेखनीय रूप से हमारे जैसी ही है और हमारी आकाशगंगा के बारे में शायद कुछ भी उल्लेखनीय नहीं है।

इस खोज से पता चलता है कि आकाशगंगा में डिस्क संबंधी विशेषताएं इनके निर्माण की मानक प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती हैं। दूसरा तथ्य कि हमारी आकाशगंगा अन्य आकाशगंगाओं के समान ही है तो इसके अध्ययन से पूरे ब्रह्मांड के अन्य अबूझ रहस्यों को भी सुलझाया जा सकता है।