IAS अधिकारी बनना कई भारतीय छात्रों का एक अनमोल सपना होता है. ये प्रतिष्ठित पद न केवल सम्मान प्रदान करता है बल्कि साथ में जिम्मेदारियां भी लाता है. इसलिए, कई यूपीएससी कैंडिडेट उस मुकाम को हासिल करने के लिए सालों तक तैयारी करते हैं. लेकिन क्या कभी आपने ये सोचा है कि भारत के पहले आईएएस या भारतीय सिविल सेवा अधिकारी कौन थे?

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सत्येंद्रनाथ टैगोर - पहले भारतीय सिविल सेवा अधिकारी

ईस्ट इंडिया कंपनी ने अनुबंधित सिविल सेवा (CCS) शुरू की थी. तब ब्रिटिश भारत था. यह बाद में भारतीय सिविल सेवा में बदल गया. वर्तमान समय की तरह, उस समय भी कैंडिडेट्स को एक प्रतियोगी परीक्षा पास करनी थी. इसके अलावा, यह परीक्षा इंग्लैंड में आयोजित की जाती थी. सत्येंद्रनाथ टैगोर परीक्षा में भाग लेने के लिए 1862 में इंग्लैंड गए. वे 1862 में भारत लौटे. तब तक उन्होंने उस देश में ट्रेनिंग की अवधि भी पूरी कर ली थी.

ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए सिविल सेवकों को कंपनी के निदेशक चुनते थे और उसके बाद लंदन के हैलीबरी कॉलेज में उन्हें ट्रेनिंग दी जाती थी और फिर भारत भेजा जाता था. अंग्रेजों ने भारत में सिविल सर्विस परीक्षा (Civil Service Exam) की शुरुआत साल 1854 में की थी.

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सत्येंद्रनाथ एक प्रसिद्ध परिवार से ताल्लुक रखते थे. वह रवींद्रनाथ टैगोर के बड़े भाई थे. उनका जन्म 1 जून 1842 को कलकत्ता के प्रसिद्ध टैगोर परिवार में हुआ था. उस समय, जोरासांको का टैगोर परिवार बंगाल और भारत के सबसे प्रभावशाली परिवारों में से एक था. सत्येन्द्रनाथ परिवार के दूसरे सबसे बड़े बेटे थे.

सत्येंद्रनाथ टैगोर का समाज में बहुत बड़ा योगदान रहा. भारत में पहले भारतीय सिविल सेवा अधिकारी होने के अलावा वह एक लेखक, गीतकार और भाषाविद् थे. उन्होंने भारतीय समाज में महिलाओं की आजादी के लिए कई काम किए. उनका विवाह ज्ञानानंदिनी देवी से हुआ था.

सत्येंद्रनाथ ने घर पर संस्कृत और हिंदी सीखी. वह 1857 में कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में बैठने वाले पहले लोगों में से एक थे. बाद में, उन्होंने प्रेसीडेंसी कॉलेज में अध्ययन किया. वह हिंदू स्कूल में भी पढ़े. 

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कैसे बने देश के पहले IAS अधिकारी? 

भारत का पहला भारतीय IAS अधिकारी बनना आसान नहीं था. सत्येंद्रनाथ टैगोर को काफी संघर्ष करना पड़ा. ब्रिटिश शासन के दौरान, यह दूसरों के लिए बेहद प्रेरणादायक था. सबसे पहले, केवल अंग्रेज ही भारतीय सिविल सेवा में शामिल हो सकते थे. हालांकि, उन्नीसवीं सदी के मध्य से भारतीय भी आवेदन कर सकते थे. लेकिन, यह केवल कुछ पदों के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से था.

1857 के भारतीय विद्रोह के बाद 1861में ICS की स्थापना की गई. ब्रिटिश कैंडिडेट्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए भारतीयों को इंग्लैंड जाना पड़ता है. उस समय के आम भारतीयों के लिए यह एक कठिन कार्य था. मोनोमोहम घोष ने इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित किया. वे सत्येंद्रनाथ के मित्र थे. वो दोनों इंग्लैंड के लिए रवाना हो गए. उनका लक्ष्य IAS परीक्षा की तैयारी करना और फिर प्रतिस्पर्धी परीक्षा में बैठना था. 

1863 में उन्हें भारत में प्रथम आईएएस अधिकारी के रूप में चुना गया. आईएएस के लिए ट्रेनिंग पूरी करने के बाद, वे 1864 में भारत लौट आए. सत्येंद्रनाथ को बॉम्बे प्रेसीडेंसी में नियुक्त किया गया था. हालांकि, यह चार महीने का प्रारंभिक ट्रेनिंग थी. बाद में, सत्येंद्रनाथ को अहमदाबाद में भारत में पहले आईएएस अधिकारी के रूप में तैनात किया गया था.

वह भारत के पहले भारतीय सिविल सेवा अधिकारी के रूप में 30 वर्षों तक सेवा में रहे. सत्येंद्रनाथ 1897 में सतारा के न्यायाधीश के रूप में सेवानिवृत्त हुए.

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