मध्यप्रदेश के मालवा की गौरवशाली राजधानी कही जानी वाली धार्मिक एवं काल गणना की नगरी उज्जयिनी (उज्जैन) में विराजित राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी मां हरसिद्धि 51 शक्तिपीठों में से एक है. उज्जैन ज्योतिर्विद्या के प्रकाण्ड प्रख्यात पंडित,​साहित्य शास्त्रज्ञ पं आनंद शंकर व्यास ने बताया कि रूद्र सागर तालाब के सुरम्य तट पर चारों ओर मजबूत प्रस्तर दीवारों के बीच, यह सुन्दर मंदिर बना हुआ है.

कहा जाता हैं कि अवन्तिकापुरी की रक्षा के लिए आस-पास देवियों का पहरा है, उनमें से एक हरसिद्धी देवी भी हैं. शिवपुराण के अनुसार यहाँ हरसिद्धी देवी की प्रतिमा नहीं हैं. सती के शरीर का अंश, अर्थात हाथ की कोहनी मात्र हैं, जो शिवजी द्वारा छिन्न-भिन्न किये जाने के समय वहां आकर गिर गई है, तांत्रिकों के सिद्धांत अनुसार यह पीठ स्थान है.

"यस्मात्स्थानांहि मातृणां पीठं से नैवे कथ्यते."

स्कंद पुराण के अंवति खण्ड में उज्जयिनी के महात्म्य में इस स्थान का परिचय इस प्रकार हैं कि प्राचीनकाल में चण्डमुण्ड नामक दो राक्षस थे, इन दोनों ने अपने प्रबल पराक्रम से समस्त संसार पर अपना आतंक जमा लिया था, एक बार ये दोनों कैलाश पर गये, शिव पार्वती द्यूत-क्रीड़ा में निरत थे. ये अन्दर प्रवेश करने लगे, तो द्वार पर ही नन्दीगण ने उन्हें जाने से रोका, इससे नन्दीगण को उन्होंने शस्त्र से घायल कर दिया. शिवजी ने इस घटना को देख तुरन्त उन्होंने चण्डी का स्मरण किया. देवी के आने पर शंकर राक्षसों के वध को आज्ञा दी.

"वध्यतां देवि तो दैत्यौ वधामति वचोऽब्रवीत"

स्वीकार कर देवी ने तत्क्षण उनको यमधाम भेज दिया. शंकर जी के निकट आकर विनम्रता से वध-वृत्त सुनाया. शंकर जी ने प्रसन्नता से कहा हे चंडी तुमने इन दुष्टों का वध किया हैं; अत: लोक-ख्याति में हरसिद्धी नाम प्रसिद्धि करेगा. तभी से इस महाकाल-वन में हरसिद्धी विराजित है.

"हरस्तामाह हे चण्डि संहतौ दानवौ"

"हरसिद्धी रतो लोके नाम्ना ख्याति गामिष्यासि"

मंदिर की चारदीवारी के अन्दर चार प्रवेश-द्वार हैं. मंदिर का द्वार पूर्व दिशा की तरफ है. द्वार पर सुन्दर बंगले बने हुए बंगले के निकट दक्षिण-पूर्व के क हैं. में एक बावड़ी बनी हुई हैं, जिसके अन्दर एक स्तम्भ हैं, उस पर सं. 1447 माधवदि. खुदा हुआ हैं, मंदिर के अन्दर देवीजी की मूर्ति नहीं हैं श्री यन्त्र बना हुआ स्थान हैं, इसी स्थान के पीछ भगवती अन्नपूर्णा की सुन्दर प्रतिमा हैं. पं आनंद शंकर व्यास ने बताया कि मंदिर के पूर्व द्वार से लगा हुआ सप्तसागर (रूद्रसागर) तालाब हैं. इस तालाब में किसी समय कमल-पुष्प खिले होते थे ऐसा नयन-मनोहर दृश्य उपस्थित करते थे कि दर्शकों की गति को रोककर क्षण-भर पुष्पराज को देखने के लिए हठात आकर्षित करते थे, बंगले के निकट एक पुख्ता गुफा बनी हुई हैं. प्रायः साधक इसमें डेरा लगाए रहते हैं देवीजी के मंदिर के ठीक सामने बड़े ऊँचे दीप-स्तम्भ खड़े हुए हैं. प्रतिवर्ष नवरात्र के दिनों में पांच दिन तक इन दीप-मालाएं लगाई जाती हैं. दीप-मालिका की परम रमणीय शोभा को देखकर मालूम होता है मानो जगमगाते हुए रत्नों के दो महान प्रकाशमान, उच्च स्तम्भ स्वर्गीय सौन्दर्य को बरसाते हुए खड़े हैं. जिस समय से यह प्रज्वलित होते हैं, उस समय रूद्रसागर में भी इनका दूर तक प्रतिबिम्ब पड़ता यह शोभा अवर्णनीय और अपूर्व तथा हृदय के अनुभव की वस्तु होती हैं.

राजा​ विक्रमादित्य ने ग्यारह बार अपने हाथों से अपने मस्तक की दी थी बलि 

उज्जैन ज्योतिर्विद्या के प्रकाण्ड प्रख्यात पंडित,​साहित्य शास्त्रज्ञ पं आनंद शंकर व्यास ने बताया कि स्कंद पुराण के अवंति खण्ड के अनुसार मां हरसिद्धि सम्राट विक्रमादित्य की अराध्य रही हैं. इस स्थान पर विक्रम ने अनेक वर्ष-पर्यन्त तप किया हैं. वहीं परमारवंशीय राजाओं की तो यहां कुल-पूजा होती रहीं हैं. मंदिर के पीछे एक कोने में कुछ 'सिर' सिंदूर चढ़े हुए रखे हैं. ये "विक्रमादित्य के सिर " बताए जाते हैं. विक्रम, ने देवी की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए ग्यारह बार अपने हाथ से अपने मस्तक की बलि दी. पर बार-बार सिर आ जाता था. बारहवीं बार सिर नहीं आया और इस तरह राजा विक्रमादित्य का शासन समाप्त हो गया. आज भी मंदिर के एक कोने में 11 सिंदूर लगे सिर रखे हुए हैं. कहते हैं ये उन्हीं के कटे हुए मुण्ड हैं.

श्रीसूक्त और वेदोक्त मंत्रों के साथ होती है पूजा

रात में हरसिद्धि मंदिर के कपट बंद होने के बाद गर्भगृह में विशेष पर्वों के अवसर पर विशष पूजा की जाती है. पं आनंद शंकर व्यास ने बताया कि शक्तिपीठ होने के कारण यहां रात के समय गर्भगृह में भक्तों की मनोकामनाओं को पूरा करने के लिए यहां विशेष तिथियों पर श्रीसूक्त और वेदोक्त मंत्रों के साथ पूजा की जाती है. इस पूजा का तांत्रिक महत्व बहुत ज्यादा है.

शक्तिपीठ मां हरसिद्धि के आंगन में दीप लगाने से होती है हर मनोकामना पूर्ण

मान्यता है कि इस चमत्कारी शक्तिपीठ पर यहां राजा के द्वारा स्थापित 1 हजार 11 दीप के स्तंभ पर दीया लगाने से हर मन्नत पूरी होती है. मान्यताओं के अनुसार दीप जलाने का सौभाग्य हर व्यक्ति को प्राप्त नहीं होता है, कहा जाता है की जिस किसी को भी यह मौका मिलता है वह बहुत ही भग्याशाली होता हैं. वहीं मंदिर के मुख्य पुजारी राजेन्द्र गिरि का कहना है की स्तंभ दीप को जलाते हुए अपनी मनोकामना बोलने पर पूरी हो जाती है. हरसिद्धि मंदिर के ये दीप स्तंभ के लिए हरसिद्धि मंदिर प्रबंध समिति में पहले बुकिंग कराई जाती है. जब भी कोई प्रमुख त्यौहार आते हैं जैसे- शिवरात्रि, चैत्र व शारदीय नवरात्रि, धनतेरस व दीपावली पर दीप स्तंभ जलाने की बुकिंग तो साल भर पहले ही श्रृद्धालुओं द्वारा करवा ली जाती है. कई बार तो श्रृद्धालुओं की बारी महीनों तक नहीं आती. पहले के समय में चैत्र व शारदीय नवरात्रि की अष्टमी तिथि तथा प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन अब ये दीप स्तंभ हर रोज़ जलाए जाते हैं.

60 लीटर तेल और 4 किलो रूई की बाती से होते है 1 हजार 11 दीप प्रज्ज्वलित

मंदिर समिति के प्रबंधक अवधेश जोशी ने बताया कि दोनों दीप स्तंभों को एक बार जलाने में लगभग 4 किलो रूई की बाती व 60 लीटर तेल लगता है. समय-समय पर इन दीप स्तंभों की साफ-सफाई भी की जाती है. पहले नवरात्रि में तथा कुछ प्रमुख त्योहारों पर ही दीप स्तंभ जलाए जाते थे, लेकिन पिछले कुछ सालों से श्रृद्धालुओं के सहयोग से हर रोज ये दीप स्तंभ जलाए जाते हैं.

उम्र 48 से 65 लेकिन मां के दरबार में उनकी शक्ति से दस मिनट में प्रज्ज्वलित हो उठती है दीप स्तंभ

मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष अवधेश जोशी ने बताया कि मंदिर में मनोहर जोशी, राजेन्द्र जोशी, रामचंद्र फूलेरिया, ओमप्रकाश चौहान और गोवरधन लाल परमार की उम्र 48 से 65 वर्ष हैं,लेकिन मां हरिसिद्ध के दरबार में ये पांच व्यक्ति दीप स्तंभ में लगे 1 हजार 11 दीपों को कुछ ही मिनटों में प्रज्ज्वलित कर देते हैं. मनोहर जोशी ने बताया कि यह कार्य वे उनकी तीन पीढ़ी से करते आ रहे हैं. उम्र इतनी होने के बाद भी मां के दरबार में ऐसी शक्ति मिलती है कि कुछ ही मिनटों में एक-एक कर दीप जगमगा उठते हैं. राजेन्द्र जोशी ने बताया कि दीपों की सफाई करना फिर बत्ती लगाना और तेल भरने में दो घंटे लगते हैं. इसके बाद जैसे ही मां की संध्या आरती शुरू होती है, वैसे ही दीप प्रज्ज्वलित करना शुरू कर दिया जाता है. रामचंद्र फूलेरिया ने बताया कि वे रोज दीपों के लिए घर में बत्ती तैयार करते हैं. पांचों भक्तों ने बताया कि मां की इस सेवा के लिए वे कभी शहर से बाहर नहीं जाते क्योंकि उन्हें ही यह कार्य करना पड़ता है. ओमप्रकाश चौहान ने बताया इस कार्य के बदले मां के आशीर्वाद स्वरूप उन्हें 2100 रुपए महीना दिया जाता हैं.

365 दिनों में से करीब 290 दिन होती है दीप मालिका प्रज्वलित

मंदिर के पुजारी राजेन्द्र गिरि ने बताया हरसिद्धि माता मंदिर में 365 दिनों में से करीब 290 दिन दीप मालिका प्रज्वलित की जाती है. गुजरात, राजस्थान के कई ऐसे परिवार हैं, जो अपनी कुल देवी हरसिद्धि मां के दरबार में कई सालों से दीप मालिका के लिए बुकिंग करवाते आ रहे हैं. मंदिर के प्रबंधक अवधेश जोशी ने बताया कि नवरात्र के समय के लिए भक्त छह महीने पहले से ही बुकिंग करवा लेते हैं. सामान्य दिनों में प्रति दिन करीब 7000 रुपए प्रति व्यक्ति खर्च आता है. नवरात्र में भक्तों की संख्या ज्यादा होने से दस लोगों को मिलाकर एक दिन दीपमालिका प्रज्ज्वलित की जाती है. नवरात्र पर्व के समय भक्तों को मात्र 2100 रुपए की रसीद कटवाना पड़ती है. इसमें से 500 रुपए मंदिर की प्रबंध समिति के पास चले जाते हैं और बाकी के रुपए से दीपमालिका में लगने वाला खर्च में लगा दिया जाता है.