.. राजीव शर्मा ..

इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की ​है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए। मैं न्यायालय की इस टिप्पणी का स्वागत करता हूं। सरकार जल्द से जल्द इस दिशा में जरूरी कदम उठाए। साथ ही यह देखा जाना चाहिए कि न्यायालय की टिप्पणी को धरातल पर कैसे उतारा जाए। अगर गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना हो तो केंद्र सरकार के लिए यह कोई मुश्किल काम नहीं है। असल इम्तिहान उसके बाद है।  

भारत इतना ज्यादा विविधतापूर्ण है कि गाय को लेकर एक ही नियम पूरे देश में लागू करना बड़ा मुश्किल होगा। यह भी न भूलें कि इस मामले में हर राज्य की परंपरागत मान्यताएं अलग हैं। खासतौर से उत्तर-पूर्व व दक्षिण के कुछ राज्यों में। वहां लोगों के खानपान में कौन-कौनसे जानवर शामिल हैं, एक बार गूगल पर जरूर सर्च कीजिए। उस स्थिति में सरकार का क्या रुख होगा?

जो लोग किसान परिवारों से हैं, (खासतौर से पश्चिमी राजस्थान के) वे जानते होंगे कि सर्दियों के दिनों में रात-रातभर जागकर फसलों की देखभाल करना कितना मुश्किल है। कितने ही खेतों में आवारों पशुओं के झुंड खड़ी फसल खा जाते हैं। उनमें ज्यादातर बछड़े होते हैं। मैंने स्कूली दिनों में फसल की रखवाली करते कई रातें ठिठुरते हुए बिताई हैं।

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अगर गाय को राष्ट्र पशु घोषित कर दिया तो खेतों की रखवाली के क्या नियम होंगे? क्या किसान अपनी फसल बचाने के लिए आवारा पशुओं के साथ थोड़ी सख्ती बरत सकेगा या उसे केस भुगतना होगा? यह स्पष्ट होना चाहिए।

यह भी विचारणीय है कि कोई गाय दूसरों के खेत में चरने को विवश क्यों होती है? इसके पीछे पेट की भूख और उचित स्थान पर भोजन उपलब्ध न होना सबसे बड़ी वजह है। गाय जब तक दूध देती है, लोग दुहते हैं। वे दूध की अंतिम बूंद तक निचोड़ लेते हैं। फिर जब वह कमजोर हो जाती है तो घर से बाहर निकाल देते हैं।

खेती के काम में बैलों की जगह ट्रैक्टरों ने ले ली है। इसलिए बछड़ों की जरूरत नहीं रही। इसके अलावा अकाल एक बड़ी समस्या है। जब चारा उपलब्ध नहीं हो पाता या बहुत महंगा हो जाता है तो बछड़े को घर बैठाकर खिलाना-पिलाना किसी आम आदमी के बूते से बाहर हो जाता है।

ऐसे में अगर सरकार गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करती है तो उसका स्वागत करूंगा, लेकिन साथ में यह कानून भी होना चाहिए कि गाय दुहने के बाद कोई उसे बेसहारा न छोड़े। ऐसे लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। इसके लिए आधार कार्ड की तरह टेक्नोलॉजी अपनाई जाए। हर गाय का कार्ड बने जिसमें उसके पालक समेत जरूरी जानकारी दर्ज की जाए। अगर भविष्य में वह गाय सड़कों पर भटकती, कूड़ा खाने को मजबूर, बीमार और बेसहारा मिले तो उसके पालक को पकड़ा जाए।  

साथ ही हर पशुपालक को पाबंद किया जाना चाहिए कि वह गाय को ठीक से रखेगा, बाहर भटकने के लिए नहीं छोड़ेगा। अगर वह बीमार होगी तो उसे चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराएगा। उसके साथ क्रूरता नहीं बरतेगा।

मैंने स्कूली दिनों में दूध भी बेचा था। उस दौरान दूध की कीमत के मामले में लोगों का दोहरा रवैया देखने को मिला। डेयरी वाला गाय के दूध की कीमत कम देता और भैंस के दूध की ज्यादा। उसके मामले में तो यह सोचकर संतोष किया जा सकता है कि वह फेट के आधार पर कीमत तय करता था। चूंकि उसे दूध जिला मुख्यालय भेजना होता था। फिर वहां से दूध की पूरी मात्रा के फेट के आधार पर भुगतान होता था।

लेकिन समाज का भी यही हाल था। बड़े-बड़े ज्ञानी पंडित, तीर्थयात्रा करने वाले, उपवास करने वाले और गौमाता की पूजा, जय-जयकार करने वाले जब गाय का दूध लेते तो कम कीमत देते।

यह भी दिलचस्प है कि हमारे देश में गाय को परंपरागत मान्यताओं के आधार पर माता का दर्जा दिया जाता है लेकिन उसकी हालत दयनीय है, जबकि ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, न्यूजीलैंड जैसे दर्जनों देश हैं जहां उसे माता का दर्जा तो नहीं है लेकिन वहां उसकी हालत बहुत बेहतर है। वहां शायद ही किसी गाय को कूड़ा या पॉलीथीन खाने को मजबूर होना पड़े। अगर कोई गाय पालता है तो उसके रहन-सहन, स्वच्छता, भोजन का बहुत खयाल रखना होता है। मेरा सवाल है कि हम ऐसा क्यों नहीं कर पाए? बल्कि हमें तो ज्यादा संवेदनशील होना चाहिए, चूंकि हम उसे माता का दर्जा देते हैं।

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इसी तरह अगर हम नदियों को माता का दर्जा देते हैं तो यह भी ध्यान रखें कि उन्हें दूषित न करें। ऐसी कई रिपोर्टें आ चुकी हैं जिनमें प्रमाण सहित बताया गया है कि हमारी नदियों का पानी कितना दूषित हो चुका है। लॉकडाउन में जब हम अपने घरों में 'बंद' थे तो नदियों का पानी निर्मल होने लगा था। इससे पता चलता है कि उन्हें दूषित करने वाले किसी और ग्रह से नहीं आ रहे है, कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार हैं।

यूट्यूब पर ऐसे अनगिनत वीडियो हैं जिनमें देखा जा सकता है कि नदियों को माता न मानने के बावजूद यूरोपीय देशों की नदियां कितनी स्वच्छ हैं। मेरा यह आशय बिल्कुल नहीं है कि आप गाय और नदियों को माता का दर्जा न दें। जरूर दें लेकिन अपनी जिम्मेदारी भी निभाएं। यहां मेरा मकसद इस मामले के दूसरे पहलू को सामने लाना था।  

सरकार कानून बनाए, यह अच्छी बात है लेकिन उससे तब तक कोई बदलाव नहीं आने वाला जब तक कि जनता अपना रवैया न बदले।

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