सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपनी व्यवस्था में कहा कि पुत्रियों को समता के उनके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता है और संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति में उनका बेटों के समान ही अधिकार होगा, भले ही हिन्दू उत्तराधिकार संशोधन कानून, 2005 बनने से पहले ही पिता की मृत्यु हो गयी हो.

शीर्ष अदालत ने कहा, ‘‘एक बेटी हमेशा प्यारी बेटी रहती है. बेटा पत्नी आने से पहले तक बेटा रहता है. बेटी जिंदगी भर बेटी रहती है. ’’ न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा, न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर और न्यायमूति एम आर शाह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956 की धारा 6 के प्रावधान में बदलाव के बाद भी इस संशोधन के पहले या इसके बाद जन्म लेने वाली पुत्रियों की सहदायिकी का दर्जा पुत्र के अधिकारों और दायित्वों की तरह ही रहता है. सहदायिक (कोपार्सनर) शब्द ऐसे व्यक्ति के लिए इस्तेमाल किया जाता है जिसका जन्म से ही पैतृक संपत्ति पर कानूनी अधिकार होता है. 

इस फैसले ने स्पष्ट कर दिया है कि पूर्वजों की संपत्ति में पुत्रियों को समान अधिकार देने का प्रावधान करने संबंधी हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956 में संशोधन पिछली तारीख से प्रभावी होगा.  शीर्ष अदालत ने 2015 के अपने एक पुराने फैसले को निष्प्रभावी कर दिया जिसमें उसने मूल रूप से कहा था कि संशोधनों के तहत अधिकार नौ सितंबर, 2005 को जीवित सहदायिक की जीवित बेटियों के लिए लागू हैं, चाहे बेटियों का जन्म कभी भी हुआ हो.

शीर्ष अदालत ने 2015 के फैसले के खिलाफ याचिकाओं पर निर्णय इस मुद्दे पर दिया कि क्या पैतृक संपत्ति में पुत्रियों को समान अधिकार देने का प्रावधान करने के लिये हिन्दू उत्तराधिकार कानून, 1956 में किये गये संशोधन पिछली तारीख से प्रभावी होंगे.

पीठ ने अपने फैसले में कहा कि नौ सितंबर, 2005 से पहले जन्मी बेटियां धारा 6 (1) के प्रावधान के तहत 20 दिसंबर, 2004 से पहले बेची गयी या बंटवारा की गयी संपत्तियों के मामले में इन अधिकारों पर दावा कर सकती हैं. चूंकि सहदायिकी का अधिकार जन्म से ही है, इसलिए यह जरूरी नहीं है कि नौ सितंबर 2005 को पिता जीवित ही होना चाहिए.

शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मुद्दे पर विभिन्न उच्च न्यायालयों और अधीनस्थ अदालतों में लंबे समय से अपील लंबित हैं और परस्पर विरोधी फैसलों की वजह से उत्पन्न कानूनी विवाद के कारण इस मामले में पहले ही काफी विलंब हो चुका है

पीठ ने कहा, ‘‘बेटियों को धारा 6 में प्रदान किये गये समता के उनके अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता है. हम अनुरोध करते हैं कि सभी लंबित मामलों का यथासंभव छह महीने के भीतर फैसला कर दिया जाये. ’’