कोरोना लॉकडाउन में ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर प्राथमिक शिक्षा लगभग बंद हो गई. गरीबों और मजदूरों के बच्चों की हालत तो इस मामले में और खराब थी. उनके पास कोई एंड्रॉइड, लैपटॉप या डिजिटल उपकरण नहीं थे, जिससे वो शिक्षा प्राप्त कर सकें. इन बच्चों को लेकर कुछ शिक्षकों ने संवेदनशीलता दिखाई और इसका ऐसा समाधान खोजा कि वे आज सबके लिए मिसाल बन गए हैं.

बच्चों की शिक्षा न रुके इसके लिए सोलापुर के नीलमनगर इलाके में स्थित मराठी विद्यालय और श्रीधर्मन्ना सादुल स्कूल ने अपने क्षेत्र में घरों की दीवारों पर ही किताबों के पाठों को चित्र के रूप में उकेर दिया. अब इलाके के बच्चे दीवारों पर लगी तस्वीरों को देखकर पढ़ रहे हैं.

बता दें कि सोलापुर शहर के पूर्वी भाग में स्थित नीलमनगर क्षेत्र में श्रमिकों की संख्या अधिक है. अधिकांश श्रमिकों के पास वित्तीय स्थिति ठीक न होने के कारण लैपटॉप या एंड्रॉइड नहीं हैं. स्कूल के ही एक शिक्षक राम गायकवाड़ ने पाठ्यक्रम के आधार पर स्कूल परिसर के घरों की दीवारों पर पाठ्यक्रम चित्रित करने का सुझाव दिया.

स्कूल के हेडमास्टर तस्लीमबानो पठान की मदद से स्कूल परिसर में स्थित घरों की दीवारों पर किताबों के पाठ चित्रित किए गए. इसमें दो महीने में बच्चों से बातें करने वाली 150 से अधिक दीवारें तैयार हो गईं. दीवारों को पेंट करने में लगभग 2 लाख रुपये का खर्च आया. यह लागत शिक्षकों और स्कूल के पूर्व छात्रों द्वारा अदा की गई.

दीवारों पर पहली-आठवीं कक्षा का पाठ्यक्रम

क्षेत्र में घरों की दीवारों पर हिंदी, मराठी, वाक्य, व्याकरण के बारे में नियम, स्वच्छता के संदेश, नंबर मल्टिपल, गणितीय पहेलियां, अंग्रेजी और मराठी वर्णमाला, शब्द,गणितीय आंकड़े आदि चित्रित किए गए हैं. इसके साथ ही स्वच्छता की आदतें, सामाजिक गतिविधियां, भौगोलिक जानकारी, वैज्ञानिक खोजों पर जानकारी खींची गई है. पहली से आठवीं तक के छात्रों के लिए बुनियादी जानकारी प्रदान की जाती है. पाठ्यक्रम से संबंधित ये बोलती दीवारें छात्रों का ध्यान आकर्षित करती हैं. इन छात्रों को ऑनलाइन शिक्षा की आवश्यकता नहीं है. इन दीवारों के सामने बच्चे रुकते हैं और पढ़ते हैं. स्कूल के शिक्षक परिसर में घूमते हैं और छात्रों की पढ़ाई पर ध्यान देते हैं. छात्रों को निर्देश देते हैं. परिणामस्वरूप छात्रों की शिक्षा बाधित नहीं हुई. शिक्षकों के इस नए विचार ने गरीब बच्चों की शिक्षा को सुविधाजनक बनाया. माता-पिता मुश्किल समय में भी अपने बच्चों की शिक्षा देने के लिए शिक्षकों का धन्यवाद कर रहे हैं.