.. राजीव शर्मा ..

पिछले हफ्ते किसी अनजान नंबर से फोन आया। कहा, 'हेलो सर, मैं मि. दीपक शर्मा बोल रहा हूं। आपको पेटीएम से 4,000 रुपए का कैशबैक मिला है। प्लीज अपना डिटेल वेरीफाई करवाइए।'

मैंने पूछा, 'आप कहां से बोल रहे हैं?'

बताया, 'मुंबई स्थित हैड ब्रांच से बोल रहा हूं।'

चूंकि मुझे उसका लहजा वैसा नहीं लगा जैसा कि आमतौर पर महाराष्ट्र के लोगों का होता है। इसलिए मुझे कुछ शक हुआ। साथ ही यह थोड़ा अजीब लगा कि कोई अपने ही नाम के साथ मिस्टर क्यों लगाएगा!

मैंने उससे कहा, 'मैं पेटीएम, फोनपे, गूगल पे कुछ भी इस्तेमाल नहीं करता। साधारण आदमी हूं, नकद में लेनदेन करता हूं। यह सब झमेले मुझे नहीं आते।'

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उसने फिर फांसने की कोशिश की, 'कोई बात नहीं सर, अपने किसी दोस्त या जान-पहचान के व्यक्ति से बात कराइए। यह रुपया उन्हें मिल जाएगा। फिर आप आधा-आधा कर सकते हैं।'

मैंने उससे कहा, 'दीपकजी, मेरी बात सुनिए। मैंने कुछ साल पहले एक ऐसे आदमी के बारे में सुना था जिसकी एक सरकारी विभाग (आप अंदाजा लगाइए वह कौनसा हो सकता है) में नौकरी लगी। यहां उसने जमकर रिश्वत कमाई। जो बेकसूर होता, उसे भी बिना रिश्वत नहीं छोड़ता। अपनी वर्दी पर बड़ा गुरूर करता था।

उसने पाप की कमाई से एक बड़ी हवेली बनाई। उसमें पूरे कुनबे के साथ रहने लगा। घर में सबको पता था कि यह गलत ढंग से पैसा कमाता है, लेकिन लालच की वजह से कोई मना नहीं करता था। जब नौकरी से रिटायर हो गया तो उसे बड़ी खुशी हुई कि एक बार भी नहीं पकड़ा गया ... अब मेरा कोई क्या बिगाड़ लेगा?

एक दिन किसी खास मौके पर पूरा खानदान हवेली में इकट्ठा था। अचानक हवेली धराशायी हो गई। उस खानदान का कोई सदस्य नहीं बचा। वह भी नहीं जिसने हवेली बनाई थी।

मैंने फोनकर्ता से कहा, 'दीपकजी, मुझे उम्मीद है कि आप समझ गए होंगे कि मैं क्या कहना चाहता हूं। आप क्यों करते हैं यह सब?'

अब तक उसके भी सुर बदल गए। कहा, 'सर, आप सच कहते हैं। मैं इस बात को जानता हूं लेकिन आप ही बताइए मैं क्या करूं?'

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उसने अपना असल नाम बताया और उस जगह के बारे में भी जहां से फोन कर रहा था। मैंने कहा, 'आज आप गलत तरीके से रुपया कमाकर खुश हो सकते हैं लेकिन मेरी यह बात लिख लीजिए कि एक दिन यही रुपया आपको रुलाएगा क्योंकि आप बेकसूर लोगों का हक मार रहे हैं। वह दिन आएगा तो आपसे सबकुछ छीनकर ले जाएगा।'

वह ध्यान से सुन रहा था। मैंने कहा, 'यह बात सच्चे दिल से कह रहा हूं। ऐसी कमाई आपको जरूर ले डूबेगी?'

उसने फिर पूछा, 'तो मैं क्या करूं?'

मैंने उसकी शिक्षा के बारे में पूछा और कहा, 'ऐसा कोई भी काम सीख लीजिए जिससे ईमानदारी के साथ गुजारा हो सके। किसी नाई की दुकान पर रहकर बाल काटना सीख लो, किसी दर्जी के पास चले जाओ, हलवाई की दुकान पर काम सीखो। रोजगार की कमी नहीं है, बस नीयत अच्छी रखो। क्या ये लोग कमाकर नहीं खा रहे? ईमानदारी की कमाई में जो सुकून है, वह पाप की कमाई में नहीं हो सकता।'

वह ध्यान से मेरी बात सुन रहा था। फिर कहा, 'ठीक है सर, मैं आज ही यह सब छोड़ देता हूं। अब कोई अच्छा काम सीखूंगा।'

मुझे नहीं मालूम कि उसने मेरी सलाह को कितनी गंभीरता से लिया है। क्या वह सचमुच बदल गया?

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