स्कन्दपुराण के अवन्ति खंड के अनुसार मध्य प्रदेश के महाकाल वन ( उज्जैन ) में विराजित नागचंद्रेश्वर मंदिर की कहानी अद्भुत है. विश्व प्रसिद्ध ज्योर्तिलिंग श्री महाकालेश्वर मंदिर के तीसरी मंजिल पर स्तिथ इस मंदिर कि खासियत यह है कि ये मंदिर साल में बस एक दिन और वो भी श्रावण शुक्ल पंचमी (नागपंचमी) पर ही खुलता है. ऐसी मान्यता है कि नागराज तक्षक स्वयं इस दिन मंदिर में रहते हैं. इसी दिन मंदिर में भक्तों को नागदेवता के दर्शन हो पाते हैं. लेकिन इस बार कोरोना वायरस के चलते 25 जुलाई को नागपंचमी के दिन भक्तों को ऑनलाइन दर्शन होंगे.

शैव संप्रदाय के नागा संन्यासी करते है प्रथम पूजा

मंदिर में ​वर्षों से चली आ रही पंरपरा के अनुसार महाकाल मंदिर में शैव संप्रदाय के नागा संन्यासी नागचंद्रेश्वर का पूजन करते है. मंदिर में श्री पंचायती महानिर्वाणी अखाड़े के गादीपति इस अद्भुत प्रतिमा की पूजा करते हैं. इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए दर्शन हेतु मंदिर खोल दिया जाता है. नागपंचमी के दिन दोपहर में 12 बजे जिले के कलेक्टर द्वारा पुजारियों के आचार्यत्व में पूजन किया जाता है.

मंदिर से जुड़े कुछ अद्भुत रहस्य

विश्व प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य पं आनंद शंकर व्यास ने बताया कि शिवपुराण अनुसार सर्पराज तक्षक ने शिवशंकर को मनाने के लिए घोर तपस्या की थी. तपस्या से भोलेनाथ प्रसन्न हुए और उन्होंने सर्पों के राजा तक्षक नाग को अमरत्व का वरदान दिया. मान्यता है कि उसके बाद से तक्षक राजा ने प्रभु के सा‍‍‍न्निध्य में ही वास करना शुरू कर दिया. लेकिन महाकाल वन में वास करने से पूर्व उनकी यही मंशा थी कि उनके एकांत में विघ्न ना हो अत: वर्षों से यही प्रथा है कि मात्र नागपंचमी के दिन ही वे दर्शन को उपलब्ध होते हैं. शेष समय उनके सम्मान में परंपरा के अनुसार मंदिर बंद रहता है. इस मंदिर में दर्शन करने के बाद व्यक्ति किसी भी तरह के सर्पदोष से मुक्त हो जाता है, इसलिए नागपंचमी के दिन खुलने वाले इस मंदिर के बाहर भक्तों की लंबी कतार लगी रहती है.

काफी प्राचीन है नागचंद्रेश्वर का मंदिर

नागचंद्रेश्वर मंदिर में 11वीं शताब्दी की एक अद्भुत प्रतिमा है, इसमें फन फैलाए नाग के आसन पर शिव-पार्वती बैठे हैं. पं आनंद शंकर व्यास ने बताया कि यह प्रतिमा नेपाल से यहां लाई गई थी. उज्जैन के अलावा दुनिया में कहीं भी ऐसी प्रतिमा नहीं है. पूरी दुनिया में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिसमें विष्णु भगवान की जगह भगवान भोलेनाथ सर्प शय्या पर विराजमान हैं. मंदिर में स्थापित प्राचीन मूर्ति में शिवजी, गणेशजी और मां पार्वती के साथ दशमुखी सर्प शय्या पर विराजित हैं. शिवशंभु के गले और भुजाओं में भुजंग लिपटे हुए हैं. यह प्रतिमा मराठाकालीन कला का उत्कृष्ट नमूना है. यह प्रतिमा शिव-शक्ति का साकार रूप है.

राणोजी सिंधिया ने 1732 में करवाया था महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धा

ज्योति​षार्चाय पं आनंद शंकर व्यास परमार राजा भोज ने 1050 ईस्वी के लगभग इस मंदिर का निर्माण करवाया था. इसके बाद सिं‍धिया घराने के महाराज राणोजी सिंधिया ने 1732 में महाकाल मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था. उस समय इस मंदिर का भी जीर्णोद्धार हुआ था. सभी की यही मनोकामना रहती है कि नागराज पर विराजे शिवशंभु की उन्हें एक झलक मिल जाए. लगभग दो लाख से ज्यादा भक्त एक ही दिन में नागदेव के दर्शन करते हैं.