.. राजीव शर्मा ..

हाल में आई एक खबर को ज्यादातर अखबारों ने कोई महत्व नहीं दिया। इसे खबर से ज्यादा चेतावनी समझना चाहिए। समाचार एजेंसी 'भाषा' ने मुंबई महानगर पालिका के आयुक्त इकबाल सिंह चहल का एक बयान प्रकाशित किया है। इनके अनुसार, साल 2050 तक कारोबारी जिले नरीमन प्वाइंट और राज्य सचिवालय ‘मंत्रालय’ सहित दक्षिण मुंबई का एक बड़ा हिस्सा पानी के नीचे चला जाएगा। इसकी वजह है समुद्र तल का बढ़ना। जब पानी ऊपर आएगा तो जमीन डूब जाएगी। वह इस बात का लिहाज नहीं करेगा कि डूबने वाली जमीन का मालिक कोई हिंदू है या मुसलमान ...।

इकबाल सिंह यह भी कहते हैं कि दक्षिण मुंबई में ए, बी, सी और डी वार्ड का 70 प्रतिशत हिस्सा डूब जाएगा। इन सबके पीछे एक बड़ी वजह जलवायु परिवर्तन है। प्रकृति चेतावनी दे रही है लेकिन यह हमारे लिए कोई मुद्दा ही नहीं।  

इकबाल सिंह बताते हैं कि अगर लोग नहीं 'जागे' तो स्थिति 'खतरनाक' हो जाएगी। कफ परेड, नरीमन प्वाइंट और मंत्रालय जैसे 80 प्रतिशत इलाके जलमग्न हो जाएंगे। ... और यह ज्यादा दूर नहीं है, 2050 आने में तीन दशक से भी कम समय बचा है।  

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अब एक और रिपोर्ट पर गौर कीजिए जो 2 सितंबर, 2021 को राजस्थान पत्रिका में प्रकाशित हुई है। यह दक्षिण ​एशिया वायु गुणवत्ता जीवन सूचकांक रिपोर्ट है। इसमें बताया गया है कि देश में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। हवा में इतना जहर घुल चुका है कि इससे इंसानों में कई बीमारियां बढ़ती जा रही हैं।  

इसका असर इतना घातक है कि आने वाले समय में हमारी उम्र में 9 साल तक की कमी आ सकती है। इसकी चपेट में करीब 48 करोड़ भारतीय होंगे। जी हां, भारतीय! वायु प्रदूषण से लोगों में अस्थमा, श्वास रोग और हृदय रोगों का खतरा बढ़ गया है।

हम सब जानते हैं कि हर साल दिल्ली में प्रदूषण किस खतरनाक स्तर तक बढ़ जाता है। पहले अस्थमा जैसी बीमारी बुजुर्गों में ही देखने को मिलती थी, अब छोटे बच्चे भी इससे पीड़ित हो रहे हैं।  

मुझे हैरानी है कि लोगों का इस ओर ध्यान ही नहीं है! वे दिनभर वॉट्सऐप ग्रुप में धर्मांधता की पोस्ट शेयर करते रहते हैं, किसी को हिंदू राष्ट्र चाहिए तो कोई अफगानिस्तान में तालिबान के सत्ता में आने पर जश्न मना रहा है। पार्टियों को सिर्फ वोटों की चिंता है। हम लोग इतने लापरवाह कैसे हो सकते हैं?

यह कोई साधारण समस्या नहीं है। जलवायु परिवर्तन हमारी ज़िंदगी में भारी उथल-पुथल मचा सकता है। इससे कहीं सूखा पड़ेगा, तो कहीं भयंकर बारिश होगी। उपज घट सकती है। वहीं, वायु प्रदूषण हमारे फेफड़े खा जाएगा। हम कोरोना की दूसरी लहर में देख चुके हैं कि फेफड़े हमारी ज़िंदगी के लिए कितनी अहमियत रखते हैं।

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इस तस्वीर को एक छोटे-से उदाहरण से समझाता हूं। मान लीजिए कि देश के किसी समुद्र तटीय गांव में एक खुशहाल परिवार रहता है। थोड़ी-सी जमीन है जिस पर खेती करते हैं। और भी कुछ काम करके आसानी से गुजारा चला लेते हैं।

धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन और वायु प्रदूषण का असर बढ़ता गया। तीस साल पहले समुद्र का जो पानी इनके खेत से काफी दूर था, अब वह उसे डुबो चुका है। परिवार का मुखिया दिनभर खांसता रहता है। जांच कराई तो फेफड़ों का कैंसर निकला। खेती चौपट हो गई, मुखिया की कमाई बंद हो गई, अब परिवार गहरे आर्थिक संकट में फंस गया।  

लड़का बड़ा होकर इंजीनियर और लड़की टीचर बनना चाहती थी। दोनों की पढ़ाई बंद हो गई। घर बेचने की नौबत आ गई। अब परिवार को सहारा देने के लिए लड़का या तो मजदूरी करेगा या शहर में जाकर कहीं छोटे-मोटे काम में हाथ आजमाएगा। लड़की भी अपने बूते के मुताबिक कुछ न कुछ करेगी। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे मौके पर हमारे रिश्तेदार कितने दयालु साबित होते हैं। अब यह परिवार कोई गलत कदम उठाएगा या किसी सूदखोर के जाल में फंसेगा।  

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(परमेश्वर ऐसा न करे) अगर यही कहानी लाखों परिवारों की हो जाए तो हमारे देश का भविष्य कैसा हो? जो लोग यह सोचते हैं कि जलवायु परिवर्तन, वायु प्रदूषण तो अंग्रेजों के चोंचले हैं, हमारा इससे क्या बिगड़ेगा, हम तो .... हैं! जो जनाब, आप गहरे अंधेरे में हैं। ऐसी समस्याएं किसी को नहीं बख्शतीं, चाहे आप किसी भी धर्म को मानने वाले हों।

प्राथमिकता के साथ करने वाले काम ये ही हैं। हमारी लापरवाही की वजह से आने वाला समय बहुत ज्यादा मुश्किल हो सकता है। नेताओं ने हमें बड़ी चालाकी से धर्मांधता, जातिवाद में उलझा रखा है और हम मूर्ख बन रहे हैं।  

मैं फिर कहता हूं, करने वाले काम ये ही हैं जिनका मैंने जिक्र किया है। इसलिए अपने दिमाग को सांप्रदायिकता से मुक्त कर इन पर गौर कीजिए। यह नहीं कहें कि 'मेरा कट्टरपंथी' अच्छा है और तुम्हारा 'कट्टरपंथी' बुरा है। इन्साफ पर कायम रहें, ढोंग न करें।

ये समस्याएं हमारे लिए बहुत बड़ी मुसीबत बनने वाली हैं। अगर अभी ध्यान नहीं दिया तो बहुत पछताएंगे। हमारे रवैए ऐसे हैं, इसीलिए 2021 में भी 1921 की समस्याएं भोग रहे हैं। कभी सोचा है, जब 2050 की समस्याएं आएंगी तो कैसे संभालेंगे?  

अब कोई यह कुतर्क न दे कि अल्लाह/परमेश्वर हमारी मदद कर देगा! वह उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है।  

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