कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच महाराष्ट्र, दिल्ली, गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में एंटी वायरल रेमडेसिविर (Remdesivir) की मांग बढ़ गई है. इसके चलते वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने रेमडेसिविर और उसको बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली सक्रिय दवा सामग्री के एक्सपोर्ट पर रोक लगा दी है. साथ ही भारत सरकार ने रेमडेसिविर को सार्वजनिक जगहों पर बेचने पर भी रोक लगाई है.

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रेमडेसिविर इंजेक्शन क्या है?

रेमडेसिविर एक एंटी वायरल दवा है, जिसे इंजेक्शन की मदद से दिया जाता है. ये वायरस की पुनरावृत्ति को रोकने में इस्तेमाल होता है. इसको 2014 में ईबोला के इलाज के लिए उपयोग में लाया गया था. इसके बाद इसे SARS और MERS के इलाज के लिए भी इस्तेमाल किया गया है. 2020 में इसे कोविड उपचार के लिए पुनर्निर्मित किया गया था. अब ये भारत में कोरोना के इलाज में इस्तेमाल की जा रही है.

रेमडेसिविर इंजेक्शन का इस्तेमाल 

साल 2009 में अमेरिकी दवा कंपनी गिलीएड साइंसेज ने हेपेटाइटिस सी के इलाज के लिए रेमडेसिविर बनाई. ये दवा सुई के माध्यम से धमनियों में लगाई जाती है. उस समय ये दवा हेपेटाइटिस सी को रोकने में नाकाम रही. रेमडेसिविर का इंजेक्शन जब वायरस से संक्रमित व्यक्ति को लगाया जायेगा तो रेमडेसिविर मरीज के शरीर में वायरस के RNA को रोक देती है.

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अध्ययनों में दावा किया गया है कि यह हल्के बीमार रोगियों में और अस्पताल में भर्ती होने के शुरुआती चरण में कोरोना के इलाज के लिए सहायक है, लेकिन गंभीर रोगियों में इसके इस्तेमाल का प्रभाव कम पड़ता है.

बता दें कि इस दवा का निर्माण करने वाली कंपनी गिलीएड ने अपनी वेबसाइट पर इस संबंध में लिखा है, "रेमडेसिविर एक प्रयोगात्मक दवा है जिसके सुरक्षित होने, या किसी भी बीमारी के इलाज में कारगर होने की पुष्टि नहीं हुई है." कंपनी ने इसके साइड इफ़ेक्ट हो सकने की भी चेतावनी दी है.

वहीं रेमडेसिविर को लेकर WHO ने कहा है कि अब तक ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिससे ये पुष्टि की जा सके कि रेमडेसिविर कोरोना वायरस के इलाज के लिए काम करता है.

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भारत में सात कंपनियां- मायलेन, हेट्रो हेल्थ केयर, जुबलियंट, सिप्ला, डॉक्टर रेड्डी लैब, सन फ़ार्मा और ज़ाइडस कैडिला रेमडेसिविर का उत्पादन करती हैं.

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