.. राजीव शर्मा ..

हमारा पड़ोसी देश चीन ... हम दोनों ही प्राचीन सभ्यता, दोनों ही दुनिया में सबसे ज्यादा आबादी वाले देश, दोनों ही संसाधनों से भरपूर। पिछले दिनों चीन ने घोषणा की थी कि वह घोर गरीबी से बाहर निकल आया, जबकि भारत आज भी गरीबी से जूझ रहा है। ऐसा नहीं है कि चीन में कोई समस्या नहीं है। उसके अपने मसले हैं लेकिन चीन लगातार तेजी से आगे बढ़ गया और हम उससे पीछे, बहुत पीछे रह गए; ऐसा क्यों?  

क्या हममें ऐसी क्षमता नहीं या चीनी हमसे बेहतर दिमाग रखते हैं? इसके कई कारण हो सकते हैं, लेकिन मैं उनमें से एक का जिक्र करूंगा। अगर चीन की शिक्षा प्रणाली, समाज की मानसिकता और शासन को देखें तो वहां कारोबार करने को बुरा नहीं माना जाता। दूसरी ओर, भारत में कारोबार करने को आज भी बहुत अच्छा नहीं माना जाता है।

इसे हम एक आसान उदाहरण से समझ सकते हैं। जिन्होंने सत्तर और अस्सी के दशक की ​बॉलीवुड फिल्में देखी हैं, वे जानते होंगे कि उनमें एक कारोबारी को किस तरह दिखाया जाता था। ​उन फिल्मों में एक कारोबारी का चित्रण लूटमार करने वाले, मिलावटखोर, लोगों का खून चूसने वाले राक्षस जैसा होता था।

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जबकि उन्हीं फिल्मों में किसान को अन्नदाता, सैनिक को रक्षक और डॉक्टर को जीवनदाता के तौर पर दिखाया गया है। मैं ऐसा नहीं कह रहा कि इनका सम्मान नहीं किया जाना चाहिए। बिल्कुल होना चाहिए, इनके बिना समाज का गुजारा नहीं है। मैं यह भी नहीं कह रहा कि सभी कारोबारी कोई देवता हैं। अगर उनमें कोई मिलावट करे, टैक्स चोरी करे, कर्मचारी का शोषण करे और कुछ भी गलत करे तो कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन इस पेशे को ऐसे नहीं दिखाया जाना चाहिए कि लोगों में यह संदेश जाए कि हर कारोबारी समाज को लूट खाने के लिए जीभ लपलपा रहा है।

जिस तरह एक मजबूत समाज के लिए किसान, सैनिक, डॉक्टर, शिक्षक और अन्य पेशे के लोग होने बहुत जरूरी हैं, उसी तरह कारोबारी भी जरूरी हैं। हमारे समाज की इसी मानसिकता ने हमें आगे नहीं बढ़ने दिया। इसका नतीजा आज हम देख रहे हैं, देश में भयंकर बेरोजगारी है।

इसके लिए किसी एक सरकार के माथे दोष मढ़ देना ठीक नहीं है, क्योंकि हर सरकार के राज में ऐसा ही हाल रहा है। युवाओं के मन में यह बात गहराई से बैठा दी गई है कि तुम्हें पढ़-लिखकर सरकारी बाबू बनना है, कुर्सी पर बैठना है। अगर तुम मेहनत का काम करोगे तो पढ़ाई किस काम की!

अक्सर घर के बड़े-बुजुर्ग और रिश्तेदार यह ताना मारते नजर आते हैं कि देख, फलाने का लड़का पटवारी बन गया, तूने ज़िंदगी में क्या किया! परिवारों में एक सोच यह होती है (चाहे वे इसे जाहिर न करें) कि अगर लड़का सरकारी नौकर बन गया तो फिर दहेज अच्छा मिल जाएगा, लड़की वाले से जमकर माल बटोरेंगे।

हमारी शिक्षा प्रणाली भी कुछ ऐसी है कि एमए, पीएचडी तक लोग किताबें ही रटते रहते हैं। यहां रटविद्या पर खासा जोर है। उन्हें कामकाज नहीं सिखाया जाता। लोग कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद भी बेरोजगार घूमते हैं।  

जबकि हमारे ही बाजारों से विदेशी कंपनियां हर साल मोटा पैसा कमाकर ले जाती हैं। क्या भारत के लोग इस अवसर का लाभ नहीं उठा सकते? जरूर उठा सकते हैं, लेकिन उनकी कोई तैयारी नजर नहीं आती।

चीन की सरकार जहां जाती है, वहां अपने कारोबारियों के लिए मौके तलाश करती है, उन्हें स्थापित करने की कोशिश करती है। इससे रोजगार के मौके मिलते हैं, लोगों के हाथों में कमाई आती है, तो गरीबी कम होती है। इसी का नतीजा है कि चीन घोर गरीबी पर विजय पा चुका है। यह सब रातोंरात नहीं हुआ। इसके लिए चीन ने वर्षों मेहनत की है।

वहीं, भारत में मामला इससे ठीक उलटा है। यहां ईमानदारी से कारोबार करना मुश्किल है। फिर, बचपन से ही दिमाग में यह बात ठूंस दी जाती है कि बेटा, तुम्हारा जन्म सिर्फ सरकारी बाबू बनने के लिए हुआ है, उसके अलावा कोई रास्ता नहीं है।

पार्टियां भी चुनाव जीतने के लिए झूठे-सच्चे वादे कर देती हैं। इस मामले में हर पार्टी बराबर है, कोई किसी से कम नहीं है। चुनाव घोषणापत्रों में किए गए वादे वोट मिलने के बाद रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिए जाते हैं। पार्टियां रोज यह झांसा देती रहती हैं कि हमें सत्ता में ले आओ, हम सरकारी नौकरी देंगे। आज तक कितनों को मिलीं, इस पर विचार किया जाना चाहिए।

इस बात को पूरी तरह समझ लें कि कोई भी पार्टी सत्ता में आ जाए, वह 100 प्रतिशत लोगों को सरकारी नौकरी नहीं देगी और न दे सकती है। मेरा तो यह मानना है कि आने वाले समय में मौजूदा सरकारी नौकरियों पर कैंची चलेगी, नई तकनीक बहुत-सी नौकरियां खा जाएगी। क्या इसके लिए कहीं कोई तैयारी है?  

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आज चीन चुपचाप मेहनत करता लगातार आगे बढ़ रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था हमारी अर्थव्यवस्था से कहीं ज्यादा मजबूत है। उसका विदेशी मुद्रा भंडार हमारे विदेशी मुद्रा भंडार से कई गुना ज्यादा बड़ा है। जबकि हम अभी तक फालतू मुद्दों को लेकर एक-दूसरे की गर्दनों पर झपट रहे हैं। हम इस सोच के साथ कभी मजबूत नहीं बन सकते।  

हमारी हालत हुजूम के उस बच्चे जैसी है जिसके गांव में कोई भूला-भटका बंदर आया तो वह उसे डराने, पत्थर मारने के लिए सड़कों पर आ गया; जब बंदर 'हूपहूप' करता है तो वह भी करता है, जब बंदर दांत दिखाता है, तो वह भी दिखाता है। जबकि उसी समय समझदार पड़ोसी का बच्चा पढ़ाई कर रहा होता है। अगर देश को मजबूत करना है तो कारोबार के महत्व को कम न समझें। बिना कारोबार और बिना कारोबारी के मुल्क का खजाना खाली होता है।  

कितने ही नबी कारोबार करते थे। हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) खुद कितने कुशल कारोबारी थे। हज़रत खदीजा (रज़ि.) उस ज़माने में कितनी कामयाब कारोबारी महिला थीं।  क्या ये मिसालें इस बात की गवाही देने के लिए कम हैं?  

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