.. राजीव शर्मा ..

एक बहन का कहना है कि 'कुछ लोगों ने धर्म के असल संदेश को इतना विकृत कर दिया है कि उन्हें देखकर लोग नास्तिक होना पसंद कर रहे हैं।' मैंने उनके कथन पर विचार किया तो इसे सच पाया।

चूंकि मैं खुद को आध्यात्मिक पुस्तकों का एक विद्यार्थी मानता हूं (भले ही औसत से भी कम दर्जे का), इसलिए मुझे सामाजिक व्यवहार का विद्यार्थी भी होना चाहिए। मैं 2013 से सोशल मीडिया को बहुत ध्यान से देख रहा हूं। तब यूट्यूब पर एक-दो लोग ऐसे हुआ करते थे जो नास्तिकता का प्रचार करते थे। आज करीब आठ साल बाद, 2021 में नास्तिकता में जबरदस्त बढ़ोतरी देखी जा रही है।

अब करीब तीन दर्जन से ज्यादा चैनल हैं जो यूट्यूब पर बहुत तेजी से बढ़ रहे हैं। Harris Sultan, Ghalib Kamal, Zafar Heretic, ExMuslim Spartacus, Mahleej Sarkari, Ex muslim Yasmin Khan, bay yaqeen, Saleem Ahmed Nastik, nasihat hussain जैसे लोग नास्तिकता के पर्याय बन चुके हैं। खासतौर से Harris Sultan तो इन सबके लीडर हैं।

कोई व्यक्ति किस धर्म या विचारधारा में विश्वास करता है, यह उसका निजी मामला है लेकिन मेरा सवाल हम धार्मिक लोगों से है - आखिर ये लोग नास्तिक क्यों बने? हम इनके सामने अपनी ज़िंदगी से बेहतरीन मिसाल क्यों नहीं पेश कर पाए? क्या यह ​हमारी विफलता नहीं है?

मैंने इन नामों का जिक्र किया है तो यह न समझें कि इनका प्रचार कर रहा हूं। इनमें 96 प्रतिशत से ज्यादा वे हैं जिन्हें मुझसे ज्यादा लोग जानते, सुनते हैं। कुछ के साथ मेरा तर्क-वितर्क होता है। वे कहते हैं- 'साबित करके दिखाओ कि अल्लाह/परमेश्वर है?' मैं कहता हूं- 'यह धरती, यह सृष्टि खुद गवाही दे रही है कि अल्लाह/परमेश्वर है। बिना बैटरी के कोई खिलौना एक इंच आगे नहीं बढ़ सकता। फिर धरती, चांद, सितारे कैसे गति कर रहे हैं? इन्हें चलाने वाली शक्ति कौन है? आप यह साबित करके दिखाएं कि अल्लाह नहीं है!'

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वे कहते हैं- 'दुनिया में धर्म के नाम पर जितना खून-खराबा हुआ, उतना किसी और वजह से नहीं हुआ।' मैं कहता हूं- 'क्या पहला और दूसरा विश्वयुद्ध धर्म की वजह से हुआ था?'

वे फिर कहते हैं- 'वो तो वर्षों पुरानी बातें हैं। आज की बात करो। अफगानिस्तान में क्या हो रहा है? वहां सभी एक ही आस्था को मानने वाले हैं, फिर क्यों मारकाट मची है? क्यों लोग हवाईजहाज के पहियों से लिपटकर भाग रहे हैं? क्यों अल्लाह का नाम लेकर गोलियां मारी जा रही हैं, बम धमाके हो रहे हैं?'  

वे यह भी कहते हैं- 'भारत में क्यों कुछ लोगों को गाय के नाम पर निशाना बनाया जाता है, बेरहमी से पीटा जाता है?'  

मैं कहता हूं- 'जो हो रहा है, ग़लत हो रहा है। लोगों ने लड़ाई के बहाने ढूंढ़ रखे हैं। वे इसमें धर्म का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि इससे आसानी हो जाती है। इसमें धर्म का दोष नहीं है।'

वे कहते हैं- 'रहने दो पंडितजी, बातों की यह जलेबी यहां नहीं चलेगी।'

मैंने यह भी देखा है कि इनमें से कई लोगों को तो संपूर्ण क़ुरआन या इसकी बहुत सारी आयतें कंठस्थ हैं। इनका गुस्सा इस बात को लेकर कम होता है कि किताबों में क्या लिखा है, बल्कि इसको लेकर ज्यादा होता है कि लोग धर्म के नाम पर क्या-क्या कर रहे हैं। वे पंडित, मौलवी, बाबा, पादरी और विभिन्न धर्मगुरुओं की आलोचना करने का मौका नहीं छोड़ते। अक्सर वे मजबूत दलील पेश करते हैं।  

जैसे- हाल में पाकिस्तान के एक मदरसे में मौलवी ने छात्र से दुष्कर्म किया। उसका वीडियो भी सामने आ गया। अब कोई मुझसे इस पर टिप्पणी मांगे तो मैं उस मौलवी का समर्थन नहीं कर सकता। मेरी हमदर्दी उस बच्चे के साथ होगी।

नास्तिकों का सवाल है- 'उस मौलवी ने ऐसा क्यों किया, धर्मशास्त्र और सही-ग़लत की पहचान उससे ज्यादा किसे होगी?'

मेरा जवाब है- 'मौलवी हो या कोई धर्मगुरु,  उसे इतना ज्यादा ऊंचा दर्जा भी न दो कि यह भ्रम पाल बैठो कि वह कोई गुनाह, ग़लती नहीं कर सकता। अगर वह ऐसे गुनाह में शामिल पाया जाए तो उसे अन्य से चौगुना दंड मिलना चाहिए।'

मेरा आकलन है कि नास्तिकता के प्रचार में नास्तिक लोगों के ईमान की कमजोरी कम, हम धार्मिक लोगों के आचरण का योगदान ज्यादा है। हम ही तो उन्हें इसका मौका दे रहे हैं, सामग्री मुहैया करा रहे हैं।  

जिस तरह यूरोप में प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के बाद धर्मगुरुओं की सत्ता को चुनौती मिली और बौद्धिक क्रांतियां हुईं, मेरा मानना है कि हमारे समय में यह काम इंटरनेट करेगा। आने वाले समय में झुंड के झुंड नास्तिक बनेंगे और इसके सबसे बड़े जिम्मेदार वे धार्मिक लोग हैं जो सोशल मीडिया पर धर्म की अच्छी बातों के प्रचार में कंजूसी बरतते हैं या अपने आचरण से कहीं न कहीं यह संदेश देते हैं कि धर्म कट्टरता और फूट डालना सिखाता है, यह प्रगति का दुश्मन है।

जबकि हकीकत यह नहीं है। हम धर्म को साथ रखते हुए भी सहिष्णुता और मेलजोल बढ़ा सकते हैं, प्रगति कर सकते हैं, अच्छी मिसाल पेश कर सकते हैं। बस, इसके लिए हमें अपने रवैयों को थोड़ा तब्दील करना होगा। अगर लोग नास्तिकता में शांति ढूंढ़ रहे हैं तो इसका सीधा अर्थ यह है कि हम अपना किरदार ठीक से नहीं निभा पाए।  

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नोट: अगर कोई व्यक्ति नास्तिक हो जाता है तो इसका यह अर्थ नहीं कि वह सम्मान या गरिमापूर्ण व्यवहार का हकदार नहीं है। वह एक इन्सान है और उसके साथ मर्यादापूर्वक अच्छा व्यवहार ही किया जाना चाहिए।

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