रिलेशनशिप (रिश्ते), रेस्पोन्सिबिलिटीज (जिम्मेदारियां), रिग्रेट (पछतावा), रिजनिंग (तर्क) और रिलीजन (धर्म) ये 5 R हमारे दिमाग में सबसे ऊपर होते हैं, जब हम किशोर से 20 साल की अवस्था के बीच या उससे आगे होते हैं. उस समय ज्यादातर क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए, इसी दुविधा में फंसे होते हैं. ये लगातार हमारे दिमाग में चलता रहता है. ये समस्या और बड़ी तब हो जाती है जब हम ऐसी दुनिया की तरफ देखते हैं, जहां जीने के लिए संघर्ष और जबरदस्त प्रतियोगिता है तो इनसे जुड़े सवाल लाखों बार मन और दिमाग पर दस्तक देते हैं. इसी तरह के कुछ सवालों के जवाब खोजने के लिए Opoyi ने बातचीत की एक योगी, लेखक और चारों तरफ खुशियां फैलाने के मिशन पर निकले आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव से. उनके अनुयायी दुनियाभर में हैं.

सवाल- क्या हमें ज्योतिष पर विश्वास करना चाहिए

सद्गुरु -ज्योतिष का मतलब है कि आप ग्रहों की स्थिति देखने और कुछ खास तरह की भविष्यवाणियां करने की कोशिश कर रहे हैं. ग्रह निर्जीव हैं. क्या निर्जीव चीजों को आपका भाग्य तय करना चाहिए या मानव स्वभाव को करना चाहिए. यदि ग्रह ही आपके भाग्य का रास्ता तय कर रहे हैं तो इसका मतलब है कि आपका मानव स्वभाव निर्जीव वस्तुओं के स्तर पर भी काम नहीं कर रहा है. ये तो गंभीर बात है.

तो क्या ज्योतिष में कुछ भी नहीं है? उसमें कुछ तो है, लेकिन ज्यादातर मनुष्य ही चीजों को नियंत्रित करता है. यदि आप एक खास तरह की अवस्था में हैं या अतिसंवेदनशील अवस्था में हैं तो ये चीजें आपके जीवन में कुछ हद तक काम करेंगी, लेकिन अगर आप अपने भीतर अच्छे से स्थापित हैं तो कोई ग्रह आपके जीवन का रास्ता तय करने वाला नहीं है.

जब कोई कहता है कि मैं आध्यात्मिक पथ पर हूं तो इसका अर्थ यह है कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ग्रह कहां हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता कि मेरे कर्म कैसे हैं, बस यही महत्वपूर्ण हो जाता है कि मैं जिस रास्ते पर जाना चाहता हूं, मैं जा रहा हूं. मैं मुक्ति की ओर जाने वाला हूं. यही आध्यात्मिकता का अर्थ है- भाग्य को अपने हाथों में ले लेना.

सवाल- आपको क्या लगता है कि संगठित धर्म उपयोगी होने के बजाय अधिक खतरनाक है?

सद्गुरु - सभी धर्म मनुष्य के भीतर की ओर जानने की एक विधि के रूप में शुरू हुए. भीतर की ओर जाने का कदम केवल एक व्यक्ति या सिर्फ वही, जो जाना चाहता है, वही उठा सकता है. यह बहुत निजी बात है, लेकिन जब लोग इस आंतरिक कदम को समूह में व्यवस्थित करने की कोशिश करने लगे तो स्वाभाविक है कि यह विकृत हो ही जाता है. यह वही है जो आप दुनिया में देख रहे हैं. जिस क्षण आप कुछ विश्वास करते हैं तो आप एक निश्चित स्तर के विश्वास के साथ आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन आवश्यक स्पष्टता के बिना ये एक बड़ी समस्या बन जाता है.

जब मुझे विश्वास हो जाता है कि मैं ही सत्य हूं, तो स्वाभाविक रूप से मैं इसे अन्य लोगों पर थोंपने की कोशिश करूंगा. मैं इसे थोंपना नहीं कहता. चलो इसे अज्ञान से बचाना कह लेता हूं. ये आपको दुख पहुंचाने के लिए नहीं है, लेकिन आप दुखी होंगे, क्योंकि किसी भी प्रकार की अज्ञानता दुखी करती ही है. अगर आप विरोध करेंगे तो मैं आपके भीतर इसकी एंट्री करवाने के लिए अन्य तरीकों का उपयोग करूंगा. इसके लिए तलवार, पैसा और हर तरह का प्रलोभन इस्तेमाल करूंगा.

सवाल-क्या कई सहयोगियों के साथ संभोग करने से आध्यात्मिकता प्रभावित होती है?

सद्गुरु -अगर आप प्यार में पड़ने और उससे बाहर निकलने के कवायद अक्सर करते हैं. बहुत सारे लोगों के साथ ऐसा करते हैं तो कुछ समय के बाद आप इसे लेकर थोड़े सुस्त पड़ जाएंगे. आप किसी को पसंद नहीं करेंगे, क्योंकि ऋणानुबंध (Runanubandha) नाम की भी कोई चीज होती है.

ऋणानुबंध दरअसल कर्म का एक निश्चित पहलू है. यह कर्म पदार्थ की एक निश्चित संरचना है. यह एक निश्चित मात्रा में लोगों के बीच होने वाली मुलाकात और मिलन के कारण होता है. यह शरीर में खास तरह की रिकॉर्डिंग होती है. यदि अंतरंगता किसी दूसरे शरीर के साथ हुई तो यह उस विशेष प्रकार की ऊर्जा का रिकॉर्ड रखता है. खासकर जब दो शरीर साथ आते हैं तो ऋणानुबंध बहुत गहरा होता है.

अब क्योंकि शरीर याद रखता है, अगर कइयों के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं तो शरीर धीरे-धीरे समय के साथ कंफ्यूज होता जाता है. यह कंफ्यूजन वह आपको जीवन में एक लाख अलग-अलग तरीकों से बताएगा. कई मायनों में जो अभी चिंता, असुरक्षा और अवसाद का प्रमुख कारण चल रहा है, वह सिर्फ इतना ही है कि शरीर भ्रमित या कहें कंफ्यूज है.

दुनिया में हर जगह ये समझा जाता है कि अगर कोई अपनी आध्यात्मिक प्रक्रिया के बारे में बहुत गंभीर हो जाता है तो वह सब सबसे पहले जो करता है वह है, सभी प्रकार के रिश्तों से दूर रहना. अगर वह स्वाभाविक रूप से किसी से भी शारीरिक संबंध को बनाता है तो चीजों को जटिल करेगा. इसलिए अगर आपके पास रिश्ता होना चाहिए तो वो एक ही शरीर के साथ होना चाहिए, क्योंकि बहुत सारे पार्टनर शारीरिक प्रणाली को कंफ्यूज या भ्रमित करेंगे.

सवाल- जब अपनी खुशी और अपने माता-पिता की खुशी के बीच चुनने का सवाल आता है तो बच्चे अपने माता-पिता के किस हद तक ऋणी होते हैं?

सद्गुरु -योग विज्ञान में अगर कोई इंसान 84 वर्ष की आयु तक जीता है तो इसे एक पूर्ण चक्र के रूप में देखते हैं. जीवन के इस चक्र में चंद्रमा के एक हजार आठ चक्रों का थोड़ा-सा समावेश होता है. जीवन के इस चक्र की पहली तिमाही तब होती है, जब माता-पिता का प्रभाव हम पर रहता है. कर्म प्रभाव के संदर्भ में कहें तो माता-पिता केवल 21 वर्ष की आयु तक ही हमें प्रभावित कर सकते हैं. उसके बाद हम उनसे प्रभावित नहीं होते. यह जानना भी महत्वपूर्ण है किसी का जीवन एकदम ताजा जीवन है. पिछली पीढ़ी में जो कुछ भी हुआ है उसकी पुनरावृत्ति नहीं है. उन्होंने जो कुछ भी किया है हम केवल कृतज्ञ रह सकते हैं. सबसे पहले तो यह कि वो हमें इस दुनिया में लाए और उन्होंने अपने प्यार और भागीदारी से हमारे लिए कई काम किए.

सवाल- आपको कैसे पता चलेगा कि आप जिस साथी के साथ रह रहे हैं, वह आपके लिए सही है?

सद्गुरु -विवाह को सफल बनाने के लिए परफेक्ट व्यक्ति की आवश्यकता नहीं है. इस ग्रह पर कोई भी परफेक्ट नहीं है. आपको जो चाहिए वह है, पूरी तरह से सच्चापन या ईमानदारी. कोई देख रहा है या नहीं, आपको उसी तरह से कार्य करना चाहिए. आप कौन हैं, कहां हैं और किसके साथ हैं, इस आधार पर आपको नहीं बदलना चाहिए. अगर एक बार आपने अपना तरीका स्थापित कर लिया तो अन्य व्यक्ति के साथ बातचीत करना एक खुशी दे सकता है. एक पहलू और है कि यदि आप एक-दूसरे से कुछ निकालने की कोशिश करते हैं और आपको या आपके साथी को वह नहीं मिलता,जो वह चाहते हैं तो इससे भी रिश्ते में संघर्ष पैदा होता है. आदर्श पुरुष या आदर्श स्त्री की तलाश मत करो, कोई है ही नहीं. यदि आप स्वीकार करते हैं, सम्मान करते हैं, प्यार करते हैं, शामिल करते हैं, देखभाल करते हैं और एक-दूसरे की जिम्मेदारी लेते हैं तो ये एक सुंदर रिश्ता हो सकता है.

सवाल- आध्यात्मिक और सामान्य भौतिकवादी जीवन को कैसे संतुलित कर सकते हैं?

सद्गुरु -भौतिक जीवन क्या है और आध्यात्मिक जीवन क्या है, यह अंतर एक निश्चित स्तर के अज्ञान से आया है. जब आप यहां बैठे हैं तो क्या आपके शरीर से आत्मा को अलग कर सकते हैं? आपका शरीर पदार्थ है, यह इस पृथ्वी का सार है. तो आप भौतिकता और आध्यात्मिकता को कैसे अलग कर सकते हैं? भौतिकता के बिना कोई आत्म नहीं और आत्म के बिना कोई भौतिकता नहीं है.

जीवन समग्र रूप में आता है. भौतिकवादी और आध्यात्मिक जैसी कोई चीज नहीं है. बहुत अंतर एक अनावश्यक संघर्ष का कारण बन रहा है. जो भी भौतिकता हम संभालते हैं, चाहे वे हमारे घर, हमारे रिश्ते, हमारे पैसे, हमारी अन्य भौतिक चीजें, उस बाहरी व्यवस्था के बारे में हैं, जिन्हें हम अपने जीवन में बाहरी सुविधाएं, आराम और आनंद के लिए बनाते हैं.

इसी तरह हम अपने भीतर की भलाई के लिए जो व्यवस्था करते हैं वह आध्यात्मिक है. आप शानदार बाहरी व्यवस्थाओं के साथ रह सकते हैं. लेकिन यदि आंतरिक रूप से गड़बड़ है तो आंतरिक रूप से आनंदित होने के लिए कोई भोजन नहीं बना है. क्या यह आपकी समस्या को हल करता है? दरअसल, दोनों को संगठित होने की जरूरत है. एक की आवश्यकता के हिसाब से दूसरा खुद को संतुलित कर लेता है.

सवाल-क्या हमारे दर्द के लिए हम ही जिम्मेदार हैं. इसके लिए कारण वही प्रियजन बनते हैं, जिन्हें हमने ही चुना है?

सद्गुरु -आप अपने जीवन में जो कुछ भी करना चाहते हैं, वह आपके माता-पिता की पसंद या आपके साथियों की पसंद या उस समाज के अनुरूप नहीं हो सकता, जहां आप रह सकते हैं. अगर आप अपनी खुद की चीजें करना चाहते हैं और यह आपके आसपास मौजूद बड़े हितों के अनुरूप नहीं है तो आपको समझना होगा कि इसके भुगतान के लिए एक कीमत होगी. यदि आप जो चाहते हैं और वह आपके लिए बहुत मायने रखता है तो आपको इसकी कीमत चुकानी होगी, लेकिन अगर आपको लगता है कि आप जो करना चाहते हैं उसके लिए कीमत बहुत ज्यादा है तो आप स्वाभाविक रूप से कदम वापस खींच लेंगे.